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Sunday, 3 May 2026

पहला साया

 पहला साया


दिन की आख़िरी साँसों के साथ

जब रोशनी अपनी परछाईं समेटने लगती है,

तब कहीं भीतर

एक साया जन्म लेता है—

बिना नाम, बिना आकार,

पर बेहद परिचित।


वह मेरे साथ चलता है,

ठीक उतनी दूरी पर

जितनी दूरी पर मैं

खुद से खड़ा हूँ।


कभी दीवारों पर चिपक जाता है,

कभी पाँवों में उलझकर

मुझे धीमा कर देता है,

और कभी

सिर्फ़ आँखों में उतर आता है

जैसे कोई अधूरी याद।


मैंने उसे छूने की कोशिश की,

तो वह और गहरा हो गया,

मैंने उसे भुलाने की कोशिश की,

तो वह और पास आ गया।


अजीब है—

यह साया मेरा है भी

और नहीं भी।


कभी लगता है

यह मेरी थकान का अंधेरा है,

कभी—

मेरे भीतर बची हुई रोशनी का प्रमाण।


रात जब पूरी तरह उतरती है,

तो वह साया

मुझमें ही विलीन हो जाता है,

और मैं सोचता रह जाता हूँ—

क्या सच में

वह मुझसे अलग था कभी?


या

मैं ही उसका

चलता-फिरता साया हूँ।


मुकेश ,

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