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Sunday, 3 May 2026

शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं

 शहर की रौनक में तन्हा-सा खड़ा था मैं

अपने ही साये से जैसे ही कटा था मैं


रात ने चुपके से आकर ये बताया मुझको

दिन के हर शोर में कितना ही छला था मैं


लोग चेहरों पे हँसी ओढ़ के मिलते थे मगर

उनकी आँखों में कहीं ग़म से जुड़ा था मैं


वक़्त की धूप ने झुलसा दिया अंदर तक यूँ

ख़ुद ही अपने लिए इक सहरा बना था मैं


तेरे जाने का असर यूँ भी दिखाई देता

भीड़ में रह के भी हर रोज़ सड़ा था मैं


आइनों से नज़रें मिलाने की हिम्मत न रही

इतना टूटा कि हर इक अक्स से डरा था मैं


ज़िंदगी मुझको पढ़ाती रही सबक़ दर सबक़

और हर बार वही भूल दोहरा था मैं


मुकेश ,,,,,,

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