कुछ लोग
अपनी ज़िंदगी ऐसे जीते हैं
जैसे उधार की किताब पढ़ रहे हों
हर पन्ना बहुत सँभालकर पलटते हुए,
कि कहीं कोई निशान न पड़ जाए।
और कुछ लोग
उसे बारिश में भीगते अख़बार की तरह जीते हैं
स्याही फैलती रहती है,
मगर वे पढ़ना नहीं छोड़ते।
मैं शायद
इन दोनों के बीच कहीं हूँ।
अब दिनों का फ़र्क
कैलेंडर से नहीं समझ आता।
सोमवार और रविवार
दो पुराने सिक्कों की तरह लगते हैं
जिन पर बनी आकृतियाँ घिस चुकी हों।
कभी-कभी
पूरा दिन
बस एक कुर्सी खिसकाने की आवाज़ में बीत जाता है।
और अजीब यह है
कि उसी छोटी-सी आवाज़ में
पूरा घर सुनाई देने लगता है।
मन भी
कितना विचित्र जीव है।
उसे बड़े हादसे हमेशा नहीं बदलते,
कई बार
एक साधारण दोपहर,
खिड़की पर टिके कौवे की आवाज़,
या किसी अजनबी का खाँसना
उसे हमेशा के लिए बदल देता है।
अब मैं लोगों को
उनकी बातों से नहीं पहचानता।
हर आदमी के पास
शब्दों का एक इस्त्री किया हुआ सूट होता है।
मैं उन्हें
उनकी चुप्पियों से पहचानता हूँ।
क्योंकि वहीं
उनका असली चेहरा
थोड़ी देर के लिए
थककर बैठ जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment