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Thursday, 28 May 2026

ज़िंदगी कभी-कभी पुरानी जेब में छूटे हुए सिक्कों जैसी लगती है

 ज़िंदगी कभी-कभी

पुरानी जेब में छूटे हुए सिक्कों जैसी लगती है 

वज़न तो महसूस होता है,

मगर उनसे अब कुछ खरीदा नहीं जा सकता।


हम सब

अपने भीतर एक बंद डाकघर लिए घूमते हैं,

जहाँ कई ख़त

बरसों से भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे होते हैं।


कुछ बातें

कह देने के लिए नहीं होतीं,

वे बस भीतर रखी रहती हैं

ठंडी होती राख में दबे अंगारों की तरह।


मैंने देखा है,

इंसान का अकेलापन

हमेशा ख़ामोश नहीं होता।

कभी-कभी वह

रसोई में उबलती केतली की सीटी बन जाता है,

या आधी रात

अचानक खुली आँखों में तैरता पंखा।


अब यादें भी

सीधी नहीं लौटतीं।

वे आती हैं

जैसे पुराने स्वेटर से

धीरे-धीरे निकलती ऊन की गंध।


एक क्षण में

पूरा बीता हुआ मौसम

कंधों पर आ टिकता है।


हम सोचते हैं

हम फ़ैसले लेते हैं,

मगर कई बार

ज़िंदगी हमें ऐसे पहन लेती है

जैसे बारिश

भीगे हुए पेड़ को पहन लेती है।


और फिर

हम उम्र भर टपकते रहते हैं।


मुझे अब लगता है

मनुष्य की आत्मा

किसी मंदिर या किताब में नहीं रहती,

वह उन चीज़ों में छिपी होती है

जिन्हें वह बार-बार छूता है 


पुराना तकिया,

दरवाज़े का हैंडल,

किसी का लिखा हुआ नाम,

या बरसों से साथ चल रही

एक मामूली-सी उदासी।


मुकेश ,,,,,,

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