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Tuesday, 26 May 2026

रेखाएँ भी बोलती हैं

 

रेखाएँ भी बोलती हैं

अब मुझे लगता है
कि मनुष्य बोलने से बहुत पहले
रेखाओं में प्रकट हो जाता है।

उसकी लिखावट में।
चलने में।
बैठने में।
यहाँ तक कि चुप रहने में भी।

उससे मेरी मुलाक़ात एक सरकारी दफ़्तर में हुई थी।

पुरानी इमारत थी।
ऊँची छतें।
सीलन की गन्ध।
और लकड़ी की मेज़ों पर वर्षों से जमा धूल।

मैं किसी फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर करवाने गया था।

वह खिड़की के पास बैठा था।
सिर झुकाए कुछ लिख रहा था।

पहले मैंने उस आदमी पर ध्यान नहीं दिया।

फिर अचानक उसकी लिखावट पर नज़र गई।

अक्षर बहुत दबाव से लिखे गए थे।
सीधी रेखाएँ इतनी कठोर थीं कि काग़ज़ पीछे से उभर आया था।
लेकिन विचित्र बात यह थी कि हर शब्द के अन्त में रेखा हल्की काँप जाती थी।

जैसे कठोरता के भीतर कहीं कोई थकान छिपी हो।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

उसने सिर उठाया नहीं।
बस पूछा —
“किस काम से आए हैं?”

आवाज़ सपाट थी।

लेकिन उसकी उँगलियाँ लगातार काग़ज़ पर चल रही थीं।

मैंने काग़ज़ आगे बढ़ाया।

उसने पढ़ना शुरू किया।

और तभी मैंने देखा 
वह हर पंक्ति के नीचे अनजाने में छोटी-छोटी रेखाएँ खींच देता था।

पहले एक।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।

मानो शब्दों पर उसे भरोसा न हो
और वह उनके नीचे कोई गुप्त सहारा बना रहा हो।

बाद में कई बार उससे मिलना हुआ।

धीरे-धीरे मुझे उसकी आदतों का ध्यान रहने लगा।

वह बात करते समय हवा में भी रेखाएँ बनाता था।
कभी सीधी।
कभी टूटी हुई।
कभी अचानक रुक जाने वाली।

उसका चेहरा अब ठीक-ठीक याद नहीं।
सिर्फ़ उसकी उँगलियाँ याद हैं।

लम्बी और हड्डियों वाली उँगलियाँ
जो हर समय किसी अदृश्य सतह पर कुछ लिखती रहती थीं।

एक दिन मैंने हँसकर पूछा 
“आप हमेशा रेखाएँ क्यों बनाते रहते हैं?”

उसने पहली बार मेरी तरफ़ ध्यान से देखा।

फिर बहुत देर बाद बोला 
“क्योंकि शब्द झूठ बोल लेते हैं।”

उसके बाद वह चुप हो गया।

लेकिन उसकी उँगलियाँ चलती रहीं।

मुझे नहीं मालूम क्यों,
उस क्षण कमरे की हवा थोड़ी उदास लगने लगी।

जैसे कोई पुरानी स्मृति अचानक पास आ गई हो।

धीरे-धीरे उसने अपने बारे में कुछ बातें बताईं।

बहुत कम।

इतनी कम कि उनसे कोई स्पष्ट कहानी नहीं बनती थी।

बस संकेत।

एक कठोर पिता।
बहुत अनुशासित बचपन।
घर में ऊँची आवाज़ों का डर।
गलतियाँ करने पर कॉपियों में लाल रेखाएँ।

“सीधा लिखो।”
“सीधे बैठो।”
“लाइन के बाहर मत जाओ।”

वह यह सब बताते हुए मुस्कुरा रहा था।
लेकिन उसकी मुस्कान के नीचे एक पुराना तनाव था।

फिर उसने अचानक कहा 
“आपने ध्यान दिया है?
डरे हुए लोग अक्सर सीधी रेखाएँ बनाते हैं।”

मैंने पूछा 
“और दुखी लोग?”

वह कुछ क्षण सोचता रहा।

फिर मेज़ पर उँगली से एक टूटी हुई रेखा खींची।

“वे रेखा पूरी नहीं कर पाते।”

उस दिन घर लौटते समय मुझे पहली बार लगा 
रेखाएँ सचमुच बोलती हैं।

कुछ रेखाएँ आदेश देती हैं।
कुछ विनती करती हैं।
कुछ काँपती हैं।
कुछ भीतर छिपे क्रोध की तरह काग़ज़ को दबाती हैं।

और कुछ…

कुछ रेखाएँ केवल यह कहती हैं
कि यह आदमी बहुत दिनों से
अपने भीतर सीधा खड़ा रहने की कोशिश कर रहा है।

बहुत वर्षों बाद भी
जब किसी पुराने काग़ज़ पर दबाव से खींची हुई रेखाएँ देखता हूँ,
मुझे उसकी याद आ जाती है।

नाम अब मिट चुका है।
चेहरा भी लगभग धुँधला है।

लेकिन उसकी वह बात अब भी भीतर कहीं बची हुई है 

“मनुष्य पहले रेखाओं में टूटता है,
शब्दों में बाद में।”

मुकेश ,,,,,,

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