छोटी रेखाएँ
अब जब उन दिनों को याद करता हूँ,
तो उसका चेहरा स्पष्ट नहीं उभरता।
सिर्फ़ उसकी आदतें याद आती हैं।
और उन आदतों में भी सबसे अधिक —
उसकी छोटी-छोटी रेखाएँ।
वह लम्बे वाक्य नहीं बोलता था।
छोटी बातें करता था।
छोटे उत्तर।
छोटी हँसी।
यहाँ तक कि उसके कदम भी छोटे थे।
पहली बार उसे देखकर मुझे लगा था —
यह आदमी जैसे जीवन में पूरी जगह नहीं घेरना चाहता।
वह कुर्सी के किनारे बैठता।
काग़ज़ पर छोटे अक्षरों में लिखता।
किताबों के पन्नों के कोनों में बहुत छोटी रेखाएँ खींचता रहता।
इतनी छोटी कि दूर से वे केवल धूल जैसी लगतीं।
मैंने एक बार पूछा था —
“ये क्या बनाते रहते हो?”
उसने काग़ज़ मोड़ दिया।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला —
“लम्बी रेखाएँ डराती हैं।”
उस समय मैं हँस दिया था।
लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया —
कुछ लोग जीवन को छोटे टुकड़ों में जीते हैं,
क्योंकि पूरा जीवन एक साथ सहना उनके लिए सम्भव नहीं होता।
उसके कमरे में भी कोई चीज़ बड़ी नहीं थी।
छोटी मेज़।
छोटा रेडियो।
आधी भरी हुई डायरी।
दीवार पर बहुत छोटे फ़्रेम।
यहाँ तक कि उसकी घड़ी की टिक-टिक भी धीमी और छोटी लगती थी।
जैसे वह हर आवाज़ को कम करना चाहता हो।
उसकी आँखों में एक अजीब सावधानी थी।
वह किसी को लगातार नहीं देख पाता था।
दो-तीन सेकंड बाद नज़र हटा लेता।
मानो मनुष्य का चेहरा भी उसके लिए बहुत विशाल अनुभव हो।
एक शाम हम चाय पी रहे थे।
बारिश के बाद की ठंड थी।
खिड़की पर पानी की पतली रेखाएँ उतर रही थीं।
वह उन्हें बहुत देर तक देखता रहा।
फिर अचानक बोला —
“क्या तुम्हें नहीं लगता, छोटी चीज़ें ज़्यादा देर टिकती हैं?”
मैंने पूछा —
“कैसी चीज़ें?”
उसने उत्तर देने में समय लिया।
“छोटी उदासियाँ।
छोटी खुशियाँ।
छोटे प्रेम।”
उसके बाद वह चुप हो गया।
मुझे हमेशा लगता था, उसके भीतर कोई बहुत बड़ा दुख है
जिसे उसने जान-बूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया है।
ताकि वह पूरी तरह टूट न जाए।
एक रात उसने शराब के नशे में केवल इतना कहा था —
“जब घर में ज़ोर से बोलना मना हो,
तो आदमी भीतर भी धीरे बोलने लगता है।”
फिर वह मुस्कुराया।
लेकिन उसकी मुस्कान भी पूरी नहीं खुली।
बस होंठों पर एक छोटी-सी रेखा बनी
और तुरन्त मिट गई।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा —
उसकी पूरी मानसिक बनावट छोटी रेखाओं से बनी थी।
वह किसी बात को अन्त तक नहीं ले जाता था।
पत्र आधे छोड़ देता।
कहानियाँ बीच में रोक देता।
प्रेम व्यक्त करते-करते अचानक मौसम की बात करने लगता।
जैसे हर भावना को छोटा कर देना
उसकी आत्मरक्षा हो।
बहुत वर्षों बाद, अब भी कभी-कभी किसी नोटबुक के कोने में खिंची छोटी रेखाएँ देखता हूँ
तो उसकी याद आ जाती है।
नाम अब लगभग मिट चुका है।
चेहरा भी धुँधला है।
लेकिन उसकी वह आदत अब भी याद है —
बात करते हुए मेज़ पर नाखून से छोटी-छोटी रेखाएँ बनाना।
मानो वह दुनिया में अपना पूरा निशान नहीं छोड़ना चाहता था।
अब सोचता हूँ —
कुछ लोग लम्बे वाक्यों, बड़े निर्णयों और तीव्र प्रेमों के लिए नहीं बने होते।
वे छोटी रेखाओं की तरह जीते हैं।
संकोच से भरे हुए।
धीरे।
लगभग अदृश्य।
लेकिन शायद वही लोग
दूसरों के भीतर सबसे लम्बे समय तक बने रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,
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