तिरछी रेखाएँ और वह दोस्त
कुछ लोग पहली नज़र में सामान्य लगते हैं।
इतने सामान्य कि उन पर ध्यान ही नहीं जाता।
फिर एक दिन अचानक
उनकी किसी छोटी-सी बात में
एक हल्का-सा झुकाव दिखाई देता है —
और उसके बाद उनका पूरा व्यक्तित्व तिरछा दिखाई देने लगता है।
वह मेरा पुराना दोस्त था।
कॉलेज के दिनों से।
उसका नाम अरुण था, लेकिन अजीब बात यह है कि अब उसकी कोई स्पष्ट स्मृति नहीं बची।
चेहरा धुँधला पड़ चुका है।
आवाज़ भी पूरी तरह याद नहीं।
सिर्फ़ उसकी रेखाएँ याद हैं।
उसकी नाक हल्की-सी दायीं ओर झुकी हुई थी।
इतनी कम कि शायद कोई और ध्यान न दे।
लेकिन जब वह किसी बात को गम्भीरता से सुनता, उसका पूरा चेहरा उसी झुकाव में बदल जाता था।
जैसे उसकी दृष्टि दुनिया को सीधे नहीं, थोड़ा कोण बनाकर देखती हो।
वह चलते समय भी सीधा नहीं चलता था।
कंधा हल्का नीचे रहता।
बात करते-करते अचानक विषय बदल देता।
हँसी में भी एक अजीब कटाव था — पूरी खुलती नहीं थी।
पहले-पहल मुझे यह सब आकर्षक लगता था।
सीधे लोग अक्सर अनुमानित होते हैं।
उनके भीतर कम रहस्य होता है।
लेकिन अरुण में हर चीज़ हल्की-सी तिरछी थी।
उसका कमरा भी।
दीवार पर लगी पेंटिंग कभी ठीक बीच में नहीं होती।
किताबें सीधी कतार में रखने के बजाय कोण बनाकर रखता।
खिड़की का पर्दा हमेशा आधा टेढ़ा रहता।
मैंने एक बार हँसकर कहा था
“तुम्हें चीज़ें सीधी रखना नहीं आता?”
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला
“सीधी चीज़ें जल्दी मर जाती हैं।”
उस समय यह वाक्य केवल विचित्र लगा था।
अब सोचता हूँ, शायद वह अपने बारे में बोल रहा था।
हम अक्सर शाम को पुराने कॉफ़ी हाउस में बैठते थे।
वह सिगरेट को भी सीधे नहीं पकड़ता था।
दो उँगलियों के बीच हल्का झुकाकर रखता, जैसे धुआँ भी किसी और दिशा में जाना चाहिए।
उसकी आँखों में एक विचित्र आदत थी।
जब वह किसी से बात करता, सीधे आँखों में नहीं देखता।
थोड़ा बगल से देखता।
मानो सामने वाले के भीतर नहीं, उसके आसपास कुछ खोज रहा हो।
कई बार मुझे लगता, वह लोगों की बात नहीं सुनता — उनके वाक्यों की दरारें सुनता है।
एक रात उसने अचानक पूछा —
“तुमने ध्यान दिया है, दुनिया की ज़्यादातर चीज़ें टूटने से पहले तिरछी होने लगती हैं?”
मैंने पूछा
“कैसे?”
वह मुस्कुराया।
कॉफ़ी के कप पर उँगली घुमाने लगा।
“दीवारें।
रिश्ते।
आदमी की नींद।
यहाँ तक कि विश्वास भी।”
उसके बाद उसने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
बाहर बारिश हो रही थी।
काँच पर पानी की लकीरें टेढ़ी होकर नीचे उतर रही थीं।
वह उन्हें देखता रहा।
फिर बहुत धीरे बोला —
“सीधी रेखा सबसे अकेली आकृति है।”
उस समय मुझे लगा, वह फिर कोई दार्शनिक बात कर रहा है।
लेकिन वर्षों बाद समझ में आया — वह अपने भीतर की संरचना बता रहा था।
धीरे-धीरे मैंने उसकी तिरछी आदतों के भीतर छिपी हुई बेचैनी को देखना शुरू किया।
वह किसी निर्णय तक पूरी तरह नहीं पहुँचता था।
प्रेम करता तो आधा।
क्रोध करता तो हँसने लगता।
विदा लेते समय लौटकर फिर कुछ कह देता।
जैसे उसका मन हर निष्कर्ष से थोड़ा हटकर खड़ा रहता हो।
मनोविज्ञान की किताबों में मैंने बाद में पढ़ा —
कुछ लोग सीधे अनुभवों से डरते हैं।
वे हर भावना को हल्का मोड़ देते हैं ताकि उसका भार कम हो जाए।
शायद अरुण भी वैसा ही था।
उसके भीतर कोई पुराना भय था
जिसे वह कभी स्पष्ट शब्दों में नहीं कह पाया।
एक बार शराब पीने के बाद उसने केवल इतना कहा था —
“जब घर में लोग चिल्लाते हैं, तो बच्चे सीधा देखना छोड़ देते हैं।”
फिर वह चुप हो गया।
मैंने उससे कुछ नहीं पूछा।
कुछ चुप्पियाँ प्रश्न सहन नहीं कर पातीं।
उस रात लौटते समय मैंने पहली बार गौर किया —
अरुण चलते हुए सड़क की सफ़ेद सीधी रेखा पर कभी पैर नहीं रखता था।
वह हमेशा उसके किनारे-किनारे चलता।
जैसे सीधापन उसे भीतर से असुरक्षित कर देता हो।
समय बीतता गया।
धीरे-धीरे हमारी मुलाक़ातें कम हो गईं।
फिर एक दिन पता चला, वह शहर छोड़कर चला गया है।
कोई निश्चित कारण नहीं।
कहा गया — नौकरी बदल ली।
किसी ने कहा — किसी स्त्री के कारण गया।
किसी ने कहा — मानसिक थकान।
लेकिन मुझे लगा, वह इसलिए गया क्योंकि कुछ लोग किसी एक जगह पर ज़्यादा देर तक सीधे नहीं रह पाते।
बहुत वर्षों बाद, एक दूसरे शहर में, भीड़ के बीच मुझे अचानक एक आदमी दिखाई दिया जिसकी नाक वैसी ही हल्की तिरछी थी।
मैं अनायास रुक गया।
लेकिन वह अरुण नहीं था।
फिर भी कई मिनट तक मेरे भीतर एक पुरानी बेचैनी घूमती रही।
उस शाम घर लौटकर मुझे पहली बार एहसास हुआ
मनुष्य का स्वभाव उसके शब्दों में कम, उसकी रेखाओं में अधिक छिपा होता है।
कोई वृत्त की तरह जीता है — लौटता हुआ।
कोई सीधी रेखा की तरह — कठोर और अकेला।
और कुछ लोग…
कुछ लोग तिरछी रेखाओं की तरह होते हैं।
वे कभी पूरी तरह टूटते नहीं,
कभी पूरी तरह जुड़ते नहीं।
बस जीवन के भीतर
हल्का-सा कोण बनाकर चलते रहते हैं —
मानो सीधे चलना
उनके लिए किसी पुराने दुख की पुनरावृत्ति हो।
मुकेश ,,,,,,
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