कमरे में सबसे पहले जो चीज़ दिखाई देती थी, वह घड़ी नहीं थी — उसकी गोल आवाज़ थी।
एक धीमी, लगभग साँस जैसी टिक-टिक, जो कमरे की दीवारों से टकराकर फैलती रहती थी।
ऐसा लगता था जैसे समय आगे नहीं बढ़ रहा, केवल गोल-गोल घूम रहा है।
मैं उससे पहली बार शहर की पुरानी लाइब्रेरी में मिला था।
दिसम्बर की शाम थी। बाहर धुँध थी और भीतर पुराने काग़ज़ों की गन्ध। वह खिड़की के पास बैठी थी और किसी मोटी किताब के किनारों पर पेंसिल से छोटे-छोटे वृत्त बना रही थी।
मैंने पहले उसका चेहरा नहीं देखा।
सिर्फ़ उसकी उँगलियाँ देखीं।
वे बहुत धीरे चलती थीं — जैसे किसी अदृश्य चीज़ को सहला रही हों।
कुछ लोगों की हरकतों में एक प्रकार का मानसिक इतिहास छिपा होता है।
उनके चलने, बैठने, वस्तुएँ उठाने के ढंग में।
उस स्त्री की उँगलियों में मुझे पहली बार एक ऐसी थकान दिखाई दी जो टूटकर नहीं, मुड़कर जीवित रही हो।
उसने अचानक सिर उठाया और पूछा —
“आप यह किताब लेंगे?”
मैंने बिना देखे किताब ले ली।
बाद में याद आया, वह पुस्तक वृत्तों पर थी — प्राचीन स्थापत्य में गोल आकृतियों का मनोविज्ञान।
उस समय यह केवल संयोग लगा था।
अब नहीं लगता।
धीरे-धीरे हमारी मुलाक़ातें होने लगीं।
हम कभी किसी निश्चित विषय पर बात नहीं करते थे।
वह अक्सर चुप रहती।
और उसकी चुप्पी में एक अजीब घरेलूपन था, जैसे पुराने घरों के आँगन में दोपहर की धूप।
उसके कमरे में पहली बार गया तो मुझे बेचैनी हुई।
कारण तुरंत समझ में नहीं आया।
फिर धीरे-धीरे मेरी नज़र चीज़ों पर गई।
पीतल का गोल दर्पण।
बेंत की गोल मेज़।
नीली किनारी वाले मिट्टी के कटोरे।
खिड़की पर रखा छोटा-सा गोल कैक्टस।
यहाँ तक कि राखदानी भी वृत्ताकार थी।
कमरे में कोई तीखी चीज़ नहीं थी।
कोई कोना भी जैसे पूरा कोना नहीं बन पाता था।
सब कुछ हल्का-सा घुमाव लिए था।
मैंने उससे पूछा —
“तुम्हें गोल चीज़ें इतनी क्यों पसन्द हैं?”
वह मुस्कुराई नहीं।
कुछ देर तक बाहर देखती रही।
फिर बोली —
“क्योंकि सीधी रेखाएँ मुझे डरा देती हैं।”
उसने यह बात बहुत सामान्य स्वर में कही थी।
जैसे कोई कहे — शाम को ठंड बढ़ जाती है।
लेकिन उसके बाद कमरे की हवा बदल गई।
मैंने पहली बार ध्यान से उसका चेहरा देखा।
वह उन लोगों में से थी जिनके चेहरे उम्र से नहीं, स्मृतियों से थकते हैं।
आँखों के नीचे हल्की धँसी हुई त्वचा, होंठों के किनारों पर स्थायी संयम।
उसने धीरे से कहा —
“सीधी रेखाएँ जल्दी फैसला कर लेती हैं।”
मैं चुप रहा।
फिर वह स्वयं बोलती गई।
“स्कूल में जब ड्राइंग बनाती थी, टीचर हमेशा कहती थीं — लाइन सीधी रखो।
पापा कहते थे — ज़िन्दगी में स्पष्ट होना चाहिए।
मेरे पति कहते थे — बात घुमाओ मत।”
उसने मेज़ पर उँगली से एक छोटा वृत्त बनाया।
“लेकिन जीवन कभी सीधा नहीं था।”
बाहर किसी ने साइकिल गिरा दी थी।
आवाज़ आई और फिर शान्ति।
वह बहुत देर तक उसी गोल निशान को देखती रही जो उसकी उँगली ने मेज़ पर बनाया था।
फिर अचानक बोली —
“क्या आपने ध्यान दिया है, दुख हमेशा लौटता है?”
मैंने कहा —
“हाँ।”
“ठीक वृत्त की तरह।”
उस रात घर लौटते समय मुझे पहली बार एहसास हुआ कि कुछ लोग रेखाओं से नहीं, आकृतियों से सोचते हैं।
और शायद उनका पूरा मानसिक संसार उसी ज्यामिति से बना होता है।
उसके बाद मैं जब भी उससे मिलता, उसकी छोटी-छोटी हरकतों को देखने लगा।
वह चाय कप में कभी किनारे तक नहीं भरती थी।
पन्ने मोड़ने के बजाय गोल निशान लगा देती।
किसी बात को समाप्त करते हुए भी उसके वाक्य पूरे बन्द नहीं होते थे।
जैसे वह हर चीज़ में वापसी के लिए जगह छोड़ देना चाहती हो।
एक शाम उसने अचानक पूछा —
“आपको लोगों में सबसे पहले क्या दिखाई देता है?”
मैंने सोचा, फिर कहा —
“उनकी आवाज़।”
वह हँसी।
उसकी हँसी भी गोल थी।
उसमें कोई तीखापन नहीं था।
धीरे-धीरे खुलती थी और फिर उसी तरह लौट जाती थी।
“मुझे लोगों की चाल दिखाई देती है,” उसने कहा।
“जो लोग भीतर से टूटे होते हैं, वे सीधा नहीं चलते।”
उस क्षण मुझे लगा, शायद वह अपने बारे में बोल रही है।
लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यही है —
वह हमेशा अपने बारे में किसी और की तरह बात करता है।
धीरे-धीरे मुझे उसके अतीत की कुछ बातें मालूम हुईं।
बहुत कम।
इतनी कम कि उनसे कोई कहानी नहीं बन सकती थी — केवल खाली जगहें बनती थीं।
एक असफल विवाह।
एक बच्चा जो जन्म के कुछ दिनों बाद मर गया था।
और उसके बाद कई वर्षों तक अकेलापन।
लेकिन विचित्र बात यह थी कि उसने कभी इन घटनाओं को सीधे शब्दों में नहीं बताया।
वह हमेशा उनके चारों ओर घूमती रही।
जैसे कोई घायल जगह को छूने के बजाय उसके आसपास उँगलियाँ फेरता रहे।
अब समझ में आता है —
कुछ स्मृतियाँ वृत्ताकार होती हैं।
वे कभी पूरी तरह सामने नहीं आतीं।
मन उनके चारों ओर चक्कर लगाता रहता है।
एक रात बहुत बारिश हो रही थी।
बिजली चली गई थी।
हम मोमबत्ती के सामने बैठे थे।
दीवार पर लौ का पीला वृत्त काँप रहा था।
अचानक उसने पूछा —
“क्या आपको लगता है कि आदमी पूरी तरह ठीक हो सकता है?”
मैंने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि उस समय मुझे उसके चेहरे से अधिक उसकी उँगलियाँ दिखाई दे रही थीं।
वे कप के किनारे पर धीरे-धीरे घूम रही थीं।
एक छोटा-सा वृत्त बनाते हुए।
बार-बार।
जैसे मन किसी पुराने दुख के चारों ओर घूम रहा हो और बाहर निकलने का रास्ता भूल गया हो।
फिर उसने बहुत धीरे कहा —
“मुझे लगता है, हम ठीक नहीं होते… बस अपनी टूटनों के चारों ओर रहने लगते हैं।”
उसके बाद कमरे में लम्बी चुप्पी रही।
और उस चुप्पी में पहली बार मुझे समझ में आया कि करुणा शायद किसी को बदलना नहीं चाहती।
वह केवल उसके चारों ओर एक सुरक्षित वृत्त बना देती है।
बहुत बाद में, जब वह शहर छोड़कर चली गई, तो उसके कमरे की सबसे अधिक याद मुझे किसी वस्तु की नहीं आई।
मुझे उसकी रेखाएँ याद आईं।
उसकी लिखावट की गोलाइयाँ।
चाय के कप पर घूमती उँगलियाँ।
बाल कान के पीछे ले जाने की धीमी वक्रता।
और बोलते समय वाक्यों का लौट-लौटकर उसी जगह आ जाना।
अब कभी-कभी लगता है —
मनुष्य का स्वभाव उसके विचारों में नहीं, उसकी आकृतियों में छिपा होता है।
कोई आदमी सीधी रेखा की तरह जीता है — निर्णयों में कठोर, स्पष्ट, अकेला।
और कोई वृत्त की तरह —
बार-बार लौटता हुआ,
टूटे हुए को अपने भीतर जगह देता हुआ,
धीरे-धीरे क्षमा बनता हुआ।
मुकेश ,,,,,,
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