वृत्ताकार रेखाएं
और फिर
एक समय ऐसा आया
जब मुझे सीधी और टूटी हुई रेखाओं से थकान होने लगी।
वे बहुत कुछ कहती थीं
संघर्ष, अनुशासन, विखंडन, भय
पर उनमें विश्राम कम था।
तभी मैंने
गोल रेखाओं को देखना शुरू किया।
पहले-पहल
वे मुझे बच्चों की चित्रकारी जैसी लगीं —
सरल, भोली, लगभग मूर्खतापूर्ण।
पर धीरे-धीरे समझ में आया
कि संसार की सबसे गहरी चीज़ें
अक्सर वृत्ताकार होती हैं।
धरती,
आँख की पुतली,
गर्भ में सिकुड़ा हुआ शिशु,
दीये की लौ के चारों ओर फैलता प्रकाश,
यहाँ तक कि स्मृति भी
सीधी नहीं चलती,
बार-बार लौटती है।
गोल रेखाओं में
एक अजीब क्षमा होती है।
वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचतीं,
किसी को काटती नहीं,
बस धीरे-धीरे
अपने भीतर जगह बनाती रहती हैं।
मुझे एक स्त्री याद आती है
जो हँसते समय
अपने बाल कान के पीछे ले जाती थी।
उसकी उँगलियों की गति में
एक गोलाई थी
जैसे हवा में कोई अदृश्य वृत्त बन रहा हो।
उसके पास बैठकर
मन शांत हो जाता था।
अब सोचता हूँ,
शायद कुछ लोग
अपने शब्दों से नहीं,
अपनी रेखाओं से प्रेम देना जानते हैं।
उसके कमरे में रखी हर चीज़ गोल थी —
पीतल का दर्पण,
मिट्टी के कटोरे,
दीवार पर टँगी घड़ी,
यहाँ तक कि उसकी लिखावट भी।
उसकी “क” और “म” की गोलाइयों में
एक घरेलू ऊष्मा थी।
मैंने एक बार उससे पूछा था
“तुम सीधी रेखाएँ कम क्यों बनाती हो?”
वह हँसी थी।
फिर बहुत देर बाद बोली —
“सीधी रेखाएँ जल्दी निर्णय ले लेती हैं।
गोल रेखाएँ थोड़ा ठहरती हैं।”
उस दिन पहली बार लगा
कि करुणा का भी
अपना ज्यामिति होता है।
और प्रेम?
शायद प्रेम वही है
जब दो अधूरे वृत्त
धीरे-धीरे एक-दूसरे के चारों ओर
घूमना सीख लेते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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