रात गहराती गई।
कमरे में रखी मेज़, कुर्सी, किताबें
सब धीरे-धीरे अपनी आकृतियाँ खोने लगीं।
अँधेरे में वस्तुएँ
पहले रंग छोड़ती हैं,
फिर आकार,
और अंत में केवल रेखाएँ बचती हैं।
मैं खिड़की के पास बैठा रहा।
सामने बिजली के तार
काले आकाश पर
कुछ उदास रेखाओं की तरह फैले थे।
उन पर बैठी चिड़ियाँ
अब दिखाई नहीं देती थीं,
केवल उनके भार से झुकती हुई रेखाएँ दिखती थीं।
तभी मुझे लगा
दुख शायद वही है
जब जीवन की रेखाएँ
अपने अर्थ से अधिक
अपने भार को महसूस करने लगती हैं।
मैंने मेज़ पर रखी पेंसिल उठाई
और बिना सोचे
एक चेहरा बनाने लगा।
पर हर बार
चेहरे की जगह
सिर्फ़ रास्ते बनते गए।
लंबी, उलझी हुई,
एक-दूसरे को काटती रेखाएँ।
जैसे भीतर कोई स्वीकार कर रहा हो
कि मनुष्य एक स्थिर आकृति नहीं,
बल्कि दिशाओं का संघर्ष है।
कुछ रेखाएँ
बार-बार एक ही जगह लौट आती थीं।
वहीं रुक जाती थीं।
शायद स्मृति का भी
अपना ज्यामिति-विज्ञान होता है।
वह आगे कम बढ़ती है,
पुराने मोड़ों पर अधिक घूमती रहती है।
अचानक ध्यान आया
हम जिन लोगों को भूल चुके होते हैं,
वे भी पूरी तरह नहीं मिटते।
वे किसी हल्की पेंसिल-रेखा की तरह
भीतर रह जाते हैं।
साफ़ दिखाई नहीं देते,
पर नए चित्र बनाते समय
बार-बार उभर आते हैं।
मैं देर तक
उन अधूरी रेखाओं को देखता रहा।
फिर धीरे से लगा,
शायद ईश्वर भी
मनुष्य को कोई पूर्ण चित्र बनाकर नहीं भेजता।
वह केवल कुछ प्रारम्भिक रेखाएँ देता है —
बाक़ी आकृति
मनुष्य को अपने दुःख, प्रेम, हानि और प्रतीक्षा से
स्वयं पूरी करनी पड़ती है।
मुकेश ,,,,,,
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