कुछ दिन पहले अलमारी के पुराने खाने को साफ़ करते समय मुझे एक नीला रिबन मिला।
बहुत साधारण-सा रिबन। किनारों से हल्का उधड़ा हुआ, जैसे वर्षों तक किसी दराज़ में दबा रहा हो।
मैंने उसे हाथ में लिया और उसी क्षण, बिना किसी स्पष्ट कारण के, मुझे वह लड़की याद आ गई।
मनोविज्ञान में शायद इसे “उद्दीपक” कहते हैं — कोई छोटी-सी वस्तु, गन्ध या ध्वनि, जो अचानक स्मृति के भीतर दबे किसी भूले हुए व्यक्ति को जगा देती है। जैसे दिमाग़ के अँधेरे कमरे में कोई पुराना दरवाज़ा अनायास खुल जाए।
वह लड़की मुझे सीधे नहीं मालूम थी। उसके बारे में पहली बार मैंने अपने एक मित्र से सुना था।
उसका घर उसी गली में था जहाँ मेरा मित्र रहता था। वह अक्सर शाम को उसके बारे में बातें करता — आधे उपहास, आधी दया के साथ।
कहता,
“तुम कभी आओगे तो दिखाऊँगा… अजीब लड़की है।”
एक दिन मैं सचमुच उसके घर गया।
पुरानी बस्ती थी। संकरी गली, जिनमें दोपहर के बाद धूप पूरी तरह नहीं पहुँचती थी। मकानों के दरवाज़े लगभग सड़क से लगे हुए। कहीं सब्ज़ी वाले की आवाज़, कहीं प्रेशर कुकर की सीटी, कहीं रेडियो पर पुराना गीत।
वहीं मैंने उसे पहली बार देखा।
वह अपने दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसने हल्का-सा फीका नीला सलवार-कुर्ता पहन रखा था और बालों में वही नीला रिबन बँधा था, जो अब इतने वर्षों बाद मेरी अलमारी से निकला था।
पहली नज़र में वह किसी भी साधारण लड़की जैसी लग सकती थी। लेकिन कुछ क्षण उसे देखने के बाद एक हल्की असामान्यता महसूस होने लगती थी।
उसकी आँखों में एक अजीब सूना-पन था।
सिर्फ़ उदासी नहीं।
मानो भीतर कोई कमरा बहुत समय से खाली पड़ा हो।
और उसी सूनेपन के साथ हर चीज़ को जान लेने की बेचैन उत्सुकता।
वह लोगों को बहुत ध्यान से देखती थी। इतना ध्यान से कि सामने वाला असहज हो जाए।
किसी के हाथ में क्या है, कौन किससे क्या कह रहा है, कौन किस समय आता-जाता है — जैसे दुनिया की हर छोटी गतिविधि उसके लिए असामान्य महत्व रखती हो।
लेकिन उस उत्सुकता में चालाकी नहीं थी। बल्कि एक बच्चे जैसी भटकती हुई ग्रहणशीलता थी।
मेरा मित्र धीरे से बोला —
“देखा? ऐसे ही खड़ी रहती है घंटों।”
वह सच कह रहा था।
बातचीत करते समय भी कई बार मैं महसूस करता कि उसकी आँखें अब भी हमारी ओर लगी हुई हैं। जब हम गली से गुज़रते, वह कभी दरवाज़े पर मिलती, कभी खिड़की से झाँकती दिखाई देती।
धीरे-धीरे मुझे भी उसकी आदत हो गई।
अब जब मैं उस गली में जाता, अनायास मेरी नज़र उसके घर की ओर उठ जाती। और अधिकांश दिनों में वह वहाँ होती।
कभी रेलिंग पकड़े हुए।
कभी सड़क पर खेलते बच्चों को देखते हुए।
कभी बिना किसी स्पष्ट कारण के आसमान की ओर देखती हुई।
मुझे याद है, एक बार बारिश हो रही थी और वह खिड़की के पास खड़ी पानी को बहुत ध्यान से देख रही थी।
उसके चेहरे पर उस समय ऐसा भाव था जैसे बारिश कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि कोई रहस्य हो जिसे केवल वही समझ सकती है।
मेरा मित्र उसके बारे में तरह-तरह की बातें बताता।
कहता, वह लोगों की छोटी-छोटी बातों से जल्दी जुड़ जाती है। कोई मुस्कुरा दे तो कई दिनों तक उसी के बारे में सोचती रहती है। कोई दो बार हाल पूछ ले तो मान बैठती है कि वह व्यक्ति उसे विशेष स्नेह करता है।
मुहल्ले वाले उसे “थोड़ी कमज़ोर दिमाग़ की” कहते थे।
लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि उसकी समस्या बुद्धि की नहीं, वास्तविकता की सीमाओं की थी।
वह कल्पना और संसार के बीच की दूरी ठीक से नहीं समझ पाती थी।
एक बार मैं मित्र के घर बैठा था। वह बाहर दरवाज़े पर खड़ी थी। अचानक उसने भीतर झाँककर पूछा —
“आप लोग क्या पढ़ रहे हैं?”
उसका स्वर बहुत धीमा था, लेकिन आँखों में असामान्य चमक थी।
मित्र ने हँसकर कोई उत्तर दे दिया।
वह कुछ क्षण वहीं खड़ी रही। फिर बिना कुछ कहे चली गई।
लेकिन जाते-जाते उसने एक बार पलटकर मुझे देखा।
उस दृष्टि में कुछ ऐसा था जिसे मैं आज तक ठीक-ठीक समझ नहीं पाया।
वह आकर्षण नहीं था।
न संकोच।
न ही सामान्य जिज्ञासा।
बल्कि ऐसा लगता था जैसे वह हर व्यक्ति को बहुत गहराई से देखती थी, क्योंकि उसके भीतर सम्बन्धों की भूख असामान्य रूप से बड़ी थी।
धीरे-धीरे मैंने उसके बारे में और बातें सुनीं।
वह लोगों की साधारण विनम्रता को भी बहुत गम्भीरता से लेने लगती थी। किसी के एक छोटे-से स्नेह से अपने भीतर पूरा सम्बन्ध बना लेती। फिर जब सामने वाला सामान्य दूरी बना लेता, तो कई दिनों तक उदास रहती।
शायद उसके भीतर प्रेम की कल्पना बहुत बड़ी थी और संसार बहुत छोटा।
कुछ समय बाद मैं उस गली में कम जाने लगा।
फिर जीवन अपने सामान्य बहाव में आगे बढ़ गया।
लेकिन अजीब बात यह है कि इतने वर्षों बाद भी जब कभी कोई नीला रिबन दिखता है, मुझे वही लड़की याद आ जाती है — दरवाज़े पर खड़ी हुई, सूनी आँखों से दुनिया को देखते हुए।
अब सोचता हूँ, शायद वह दुनिया को समझना नहीं चाहती थी।
वह केवल उससे जुड़ना चाहती थी।
और कई बार ये दोनों इच्छाएँ देखने में एक जैसी लगती हैं, जबकि वास्तव में बहुत अलग होती हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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