झब्बू लाल
अब जब मुहल्ले के पुराने लोगों की बातें याद करता हूँ, तो उनमें सबसे धुँधली और सबसे विचित्र आकृति झब्बू लाल की लगती है।
शायद इसलिए कि वह अपने जीवन में कभी पूरी तरह उपस्थित ही नहीं थे।
वे हमेशा कुछ पीछे छूटे हुए आदमी लगे — जैसे दुनिया की बातचीत उनसे थोड़ी तेज़ चल रही हो और वे हर बार अर्थ समझते-समझते देर कर देते हों।
उनका असली नाम जगदीश प्रसाद था, लेकिन मुहल्ले में कोई उन्हें उस नाम से नहीं बुलाता था। बचपन में उनके घुँघराले, बिखरे बालों के कारण किसी ने उन्हें “झब्बू” कहा था, और वही नाम उनकी पूरी ज़िन्दगी पर चिपक गया।
वे एक सम्पन्न परिवार से थे। बड़ा मकान, किराए की दुकानें, खेत, पुरानी जमा-पूँजी — अभाव कुछ नहीं था।
केवल एक चीज़ की कमी थी — वह सामान्य सहजता, जिसके सहारे मनुष्य दुनिया में अपने लिए जगह बना लेता है।
झब्बू लाल की बुद्धि पूरी तरह खराब नहीं थी। वे अख़बार पढ़ लेते, हिसाब-किताब का मोटा काम कर लेते, लोगों को पहचानते भी थे। लेकिन बात करते समय उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की असमंजस भरी मुस्कान रहती, मानो वे हर क्षण दूसरों की प्रतिक्रिया देखकर अपना व्यवहार तय कर रहे हों।
बचपन में लोग उन्हें प्यार से सह लेते हैं।
युवावस्था में उन्हीं बातों पर हँसने लगते हैं।
और एक उम्र के बाद उनसे बचने लगते हैं।
उनके साथ भी यही हुआ।
उनकी माँ को जीवन भर यही चिन्ता रही कि किसी तरह उनका विवाह हो जाए। रिश्ते आते। लोग बैठक में बैठते। चाय पी जाती। फिर लड़की वाले विनम्र अस्वीकृति के साथ चले जाते।
कारण कभी साफ़ नहीं कहा जाता था।
लेकिन सब जानते थे।
झब्बू लाल की आँखों में एक अजीब अधूरापन था। वे बातचीत के बीच अचानक हँस पड़ते, या बिना वजह किसी बात को बार-बार दोहराने लगते। कई बार लड़की के सामने ही भविष्य के बच्चों के नाम सोचने लगते।
लोग लौटकर कहते —
“आदमी बुरा नहीं है… पर…”
यह “पर” धीरे-धीरे उनकी पूरी ज़िन्दगी बन गया।
उम्र बढ़ती गई।
चालीस के बाद उनके भीतर विवाह की इच्छा लगभग बेचैनी में बदल गई। वे जहाँ भी किसी शादी की बात सुनते, उत्सुक हो उठते। दूल्हे को देर तक देखते रहते। कई बार शराब पीकर रोते हुए कहते —
“सबका घर बस गया…”
उनके भीतर प्रेम की कल्पना बहुत भोली थी।
उन्हें लगता था, विवाह होते ही जीवन अचानक व्यवस्थित और गर्म हो जाएगा। कोई उनका इन्तज़ार करेगा, उनके कपड़े तह करेगा, उनसे नाराज़ होगा, उन्हें दवा देगा।
असल में वे स्त्री से अधिक घरेलू स्नेह के भूखे थे।
लेकिन मुहल्ला केवल उनकी इच्छा नहीं देखता था; उसका उपहास भी करता था।
धीरे-धीरे उनके बारे में गन्दी फुसफुसाहटें शुरू हुईं।
कहा गया कि उन्होंने घर की कामवाली को छूने की कोशिश की। फिर किसी दूसरी औरत को पैसे दिए। एक बार तो बड़ा हंगामा हुआ। परिवार ने पैसे देकर मामला दबाया।
उसके बाद लोग उन्हें और नीची निगाह से देखने लगे।
लेकिन अब सोचता हूँ, उस पूरे प्रसंग में सबसे दुखद बात उनका व्यवहार नहीं था — बल्कि वह भयानक अकेलापन था जिसमें आदमी धीरे-धीरे शर्म और इच्छा के बीच भटकने लगता है।
उनके भीतर शरीर था, आकांक्षा थी, लेकिन उसे जीने की सामाजिक योग्यता नहीं थी।
ऐसे लोग अक्सर हास्य का पात्र बन जाते हैं।
क्योंकि समाज अधूरी इच्छाओं से डरता है।
फिर वह घटना हुई जिसके बाद उन्होंने लगभग घर से निकलना बन्द कर दिया।
एक दोपहर किसी ने उन्हें शहर के बाहर वाली सड़क पर एक भिखारिन युवती के साथ देख लिया। बात क्या थी, कोई ठीक से नहीं जानता। शायद उन्होंने उसे खाना खिलाया था, शायद पैसे दिए थे, शायद केवल उसके साथ बैठे थे।
लेकिन मुहल्ले को सत्य से अधिक कहानी चाहिए होती है।
अगले ही दिन तरह-तरह की बातें फैल गईं। लोग हँसे। लड़कों ने फब्तियाँ कसीं। उनके बड़े भाई ने कई दिनों तक दरवाज़ा बन्द रखा।
उसके बाद झब्बू लाल कम दिखाई देने लगे।
कभी-कभी शाम को बरामदे में बैठते दिख जाते। बाल और सफ़ेद हो गए थे। पेट ढीला पड़ गया था। लेकिन सबसे अधिक बदल गई थी उनकी आँखें।
उनमें अब इच्छा कम, भय अधिक था।
जैसे वे दुनिया से क्षमा माँगते-माँगते थक गए हों।
फिर एक दिन पता चला कि वे घर छोड़कर चले गए।
परिवार ने शुरू में खोजा। फिर धीरे-धीरे सब चुप हो गया।
कई महीनों बाद मुहल्ले के एक आदमी ने लौटकर बताया कि उसने उन्हें हरिद्वार में देखा है।
वे कुछ साधुओं के साथ बैठे थे। दाढ़ी बढ़ी हुई थी। गेरुए जैसे मैले कपड़े पहने थे। हाथ में माला थी।
पहचानने पर पहले तो झब्बू लाल घबरा गए। फिर धीरे से हँस दिए।
उस आदमी ने पूछा —
“यहाँ कैसे?”
उन्होंने कहा —
“यहाँ कोई शादी के बारे में नहीं पूछता…”
जब मैंने यह बात पहली बार सुनी थी, तब लोग हँसे थे।
लेकिन अब, इतने वर्षों बाद, वह वाक्य मुझे किसी गहरे अँधेरे कुएँ से आती आवाज़ जैसा लगता है।
क्योंकि मनुष्य केवल रोटी या सम्मान से नहीं टूटता।
कई बार वह उस जीवन के न मिलने से टूटता है, जिसकी कल्पना उसने बहुत मासूमियत से की थी।
और शायद झब्बू लाल अन्ततः संसार से नहीं भागे थे।
वे केवल उस प्रश्न से भागे थे, जो पचास वर्षों तक हर चेहरा उनसे पूछता रहा —
“तुम्हें किसी ने चुना क्यों नहीं?”
मुकेश ,,,,,,,,
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