भूलने की आदत
अब जब मैं उस बूढ़े आदमी के बारे में सोचता हूँ, तो सबसे पहले उसका चेहरा नहीं याद आता।
सबसे पहले याद आती है उसकी जेबें।
उसकी पतलून की ढीली, पुरानी जेबें, जिनमें हमेशा कुछ न कुछ छूटा हुआ रहता था — मुड़े हुए काग़ज़, पुरानी दवाइयों की पर्चियाँ, किसी दुकान का बिल, चाबियों का अधूरा गुच्छा, और कभी-कभी ऐसी वस्तुएँ जिनका अब उससे कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था।
वह हमारे पड़ोस में रहता था। अकेला नहीं — उसका परिवार था, बेटा था, बहू थी, एक पोता भी। घर में लोगों की कमी नहीं थी। फिर भी उसके चारों ओर धीरे-धीरे एक ऐसा खालीपन जमा हो गया था, जिसे केवल उपस्थित लोगों से भरा नहीं जा सकता था।
उसकी आयु सत्तर के आसपास रही होगी। शरीर अब भी पूरी तरह टूटा नहीं था। वह सुबह टहलने जाता, बाज़ार तक पैदल चला जाता, कभी-कभी अख़बार भी ध्यान से पढ़ता। पहली नज़र में उसमें कोई विशेष असामान्यता दिखाई नहीं देती थी।
समस्या केवल इतनी थी कि वह भूलने लगा था।
शुरू में यह बात मामूली लगी।
वह चश्मा खोजता रहता जबकि वह उसके सिर पर रखा होता। चाय गैस पर चढ़ाकर दूसरे कमरे में चला जाता। दरवाज़ा खुला छोड़ देता। बातें दोहराने लगा था।
परिवार पहले इस पर हँसता था।
बहू मुस्कुराकर कहती —
“बाबूजी फिर भूल गए।”
वह भी हँस देता।
लेकिन कुछ आदतें धीरे-धीरे हँसी से बाहर निकल आती हैं।
एक दिन वह सब्ज़ी लेने गया और रास्ता भूल गया। दो घंटे बाद किसी परिचित ने उसे दूसरी कॉलोनी में भटकते देखा। वह शर्मिंदा था, लेकिन उससे अधिक परेशान इस बात से था कि उसे स्वयं याद नहीं आ रहा था कि वह वहाँ पहुँचा कैसे।
उसके बाद घर का व्यवहार बदलने लगा।
बहू ने रसोई की चीज़ें उससे दूर रखनी शुरू कर दीं। बेटा बार-बार पूछता —
“दवा ली थी या नहीं?”
उसके उत्तर देने के पहले ही फिर पूछ लेता।
धीरे-धीरे उससे छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ भी ले ली गईं।
अब उससे बिजली का बिल जमा नहीं कराया जाता था। उसे अकेले बाज़ार नहीं भेजा जाता। यहाँ तक कि कई बार लोग उसकी बात बीच में ही काट देते, मानो उसके वाक्य पूरे होने के पहले ही अप्रासंगिक हो चुके हों।
और शायद यहीं से उसका वास्तविक अकेलापन शुरू हुआ।
क्योंकि मनुष्य केवल चीज़ें नहीं भूलता —
एक समय के बाद लोग भी उसे याद रखना कम कर देते हैं।
मैं कभी-कभी शाम को उसके पास बैठ जाता था। वह बरामदे में कुर्सी डालकर बैठता और सड़क को देखता रहता।
एक दिन उसने मुझसे पूछा —
“आपको कभी ऐसा लगता है कि दिमाग़ के भीतर कोई धीरे-धीरे चीज़ें मिटा रहा है?”
उसने यह बात बहुत साधारण स्वर में कही थी, जैसे मौसम के बारे में पूछ रहा हो।
मैंने उत्तर नहीं दिया।
वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला
“पहले मुझे लगता था भूलना आराम देता है। अब लगता है आदमी भूलते-भूलते खुद भी थोड़ा-थोड़ा कम हो जाता है।”
उस दिन हवा में धूप और पुरानी किताबों जैसी गन्ध थी। सामने बच्चे खेल रहे थे। दुनिया सामान्य थी। लेकिन उसके वाक्य में ऐसी थकान थी जिसे सुनकर मुझे पहली बार उससे डर लगा।
उसकी भूलने की आदत अजीब थी।
उसे बहुत पुरानी बातें साफ़ याद रहतीं। अपने कॉलेज का रास्ता, किसी मित्र की साइकिल, अपनी पत्नी की पहली साड़ी। लेकिन सुबह की घटना शाम तक धुँधली हो जाती।
कई बार वह अपनी मृत पत्नी के बारे में वर्तमान काल में बात करता।
“वह बाज़ार गई है।”
फिर अचानक बीच वाक्य में रुक जाता।
उसके चेहरे पर उस समय जो भाव आता, उसे ठीक-ठीक शब्दों में कहना कठिन है। वह दुख नहीं था। बल्कि ऐसा लगता था जैसे स्मृति और वास्तविकता के बीच चलते-चलते उसका पैर अचानक किसी खाली जगह पर पड़ गया हो।
घर में अब लोग उससे थोड़ा बचकर रहने लगे थे।
कोई क्रूरता नहीं थी, केवल अधीरता थी। और अधीरता कई बार क्रूरता से अधिक अपमानजनक होती है।
वह बातें भूलता, लोग उसे सुधारते।
वह फिर भूलता।
फिर वही सुधार।
धीरे-धीरे उसने बोलना कम कर दिया।
अब वह अधिकतर खिड़की के पास बैठा रहता। कई बार घंटों तक।
एक शाम मैं उसके कमरे में गया। वह अपनी पुरानी अलमारी खोले बैठा था। भीतर काग़ज़, तस्वीरें और पुराने खत बिखरे थे।
उसने एक तस्वीर उठाकर मुझसे पूछा —
“ये कौन हैं?”
तस्वीर उसकी पत्नी की थी।
मैंने धीरे से बताया।
वह बहुत देर तक तस्वीर देखता रहा। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला —
“अजीब बात है… चेहरा पहचान में आता है… लेकिन याद नहीं आता कि इन्हें खोकर दुख कितना हुआ था।”
उस क्षण मुझे पहली बार लगा कि भूलना हमेशा त्रासदी नहीं होता।
कभी-कभी वह दुख पर समय की डाली हुई सफ़ेद चादर भी होता है।
लेकिन शायद समस्या यह थी कि उसके भीतर भूलना और याद रखना अब एक-दूसरे में उलझ गए थे।
कुछ दिनों बाद उसने घर से निकलना लगभग बन्द कर दिया।
अब वह चीज़ों को बहुत ध्यान से देखने लगा था — मेज़, कप, दीवार, घड़ी। जैसे उन्हें याद कर लेना चाहता हो, इससे पहले कि वे भी भीतर से धुँधले हो जाएँ।
एक दिन उसने मुझसे अचानक पूछा —
“अगर आदमी खुद को ही भूल जाए, तो क्या बचता है?”
मैंने उस समय उत्तर देने की कोशिश की, लेकिन कोई उत्तर पर्याप्त नहीं लगा।
अब इतने वर्षों बाद सोचता हूँ, शायद मनुष्य केवल स्मृतियों से नहीं बना होता।
उसकी आदतें भी उसे बचाए रखती हैं।
उसकी चाल, उसका चाय पीने का ढंग, उसका किसी नाम को पुकारना।
शायद इसी कारण वह बूढ़ा आदमी पूरी तरह कभी गायब नहीं हुआ।
भले ही वह नाम भूल जाता था, रास्ते भूल जाता था, तारीखें भूल जाता था
लेकिन हर शाम बरामदे में बैठकर सड़क देखना नहीं भूला।
और कई बार मुझे लगता है कि जीवन अन्ततः स्मृति से कम, प्रतीक्षा से अधिक बना है।
वह आख़िरी वर्षों तक किसी चीज़ की प्रतीक्षा करता रहा
शायद याद लौट आने की,
शायद अपनी पत्नी की,
या शायद उस व्यक्ति की, जो वह कभी हुआ करता था।
मुकेश ,,,,,,,,
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