अनुपस्थिति का प्रेम
अब जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो मुझे सबसे पहले उसका चेहरा नहीं याद आता।
सबसे पहले याद आती है — सीढ़ियाँ।
पुराने मकान की सँकरी, घिसी हुई सीढ़ियाँ, जिन पर हमेशा हल्की नमी बनी रहती थी और जिनके मोड़ों पर दिन के किसी भी समय आधा अँधेरा जमा रहता था। स्मृति अक्सर मनुष्यों से पहले स्थानों को बचाकर रखती है। शायद इसलिए कि स्थान हमसे कम विश्वासघाती होते हैं।
मैं तब पच्चीस वर्ष का था और उस उम्र की लगभग हर बीमारी से ग्रस्त था — अनावश्यक उदासी, अपने ही विचारों के प्रति आकर्षण, और यह भ्रम कि जीवन किसी गहरे अर्थ की ओर बढ़ रहा है।
शहर नया था। कमरा छोटा। शामें लम्बी।
मैं ऊपर की मंज़िल पर किराए से रहता था। वह ठीक सामने वाले हिस्से में रहती थी।
पहली बार मैंने उसे बरामदे में देखा था। वह नीचे सड़क की ओर देख रही थी। उसके बाल पीछे ढीले बँधे थे और उसने शायद मुझे देखा भी नहीं। लेकिन उसके आसपास एक ऐसी शान्ति थी जिसने मुझे कुछ क्षणों के लिए रोक लिया।
उसकी आयु मुझसे काफी अधिक रही होगी। चालीस के आसपास। उस समय वह उम्र मुझे लगभग रहस्यमय लगती थी। ऐसा लगता था जैसे उस उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य जीवन के बारे में कोई ऐसा ज्ञान पा लेता है जो युवावस्था को उपलब्ध नहीं।
कई दिनों तक हमारा कोई परिचय नहीं हुआ। केवल सीढ़ियों पर, बरामदे में या पानी भरते समय कभी-कभी सामना हो जाता।
वह बहुत हल्के से मुस्कुराती थी।
उस मुस्कान में आत्मीयता कम, विनम्र थकान अधिक होती थी। जैसे वह संसार के अधिकांश सम्बन्धों से धीरे-धीरे बाहर आ चुकी हो और अब केवल शिष्टाचार के स्तर पर लोगों के बीच उपस्थित हो।
फिर एक दिन वह घटना हुई जिसे उस समय मैंने महत्वहीन समझा था, लेकिन अब लगता है कि स्मृति ने उसी छोटे-से क्षण के चारों ओर पूरा अतीत बना लिया।
मैं नीचे डाकघर से लौट रहा था जब देखा, वह सड़क पर खड़ी है। उसके पास एक बड़ा-सा बक्सा रखा था — शायद किताबों या पुराने काग़ज़ों का। रिक्शावाला उसे दरवाज़े तक छोड़कर जा चुका था।
उसने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुई।
मैंने बिना कुछ कहे बक्सा उठा लिया।
वह मेरे आगे-आगे सीढ़ियाँ चढ़ती रही। मुझे आज भी याद है — उस दिन उसने हल्की भूरी साड़ी पहन रखी थी और सीढ़ियाँ चढ़ते समय वह हर मोड़ पर क्षण-भर रुकती थी, मानो साँस लेने के लिए नहीं, किसी विचार से बाहर आने के लिए।
उसका कमरा खुला हुआ था।
मैंने बक्सा भीतर रख दिया।
कमरे में किताबों की गन्ध थी। एक खिड़की आधी खुली थी, और बाहर से बरसात के बाद की हवा आ रही थी। मेज़ पर कुछ संगीत की नोटबुकें रखी थीं। दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी, जिसे मैं ठीक से देख नहीं पाया।
“धन्यवाद,” उसने कहा। फिर थोड़ी देर रुककर जोड़ा —
“अगर जल्दी न हो तो चाय पीजिए।”
मैंने हाँ कह दी।
अब सोचता हूँ तो लगता है कि मनुष्य जीवन के कुछ निर्णायक क्षणों में बहुत साधारण ढंग से प्रवेश करता है। उसे उस समय बिल्कुल पता नहीं होता कि बाद में वही क्षण उसकी स्मृति में असामान्य चमक लेने वाले हैं।
उसने रसोई में जाकर पानी चढ़ाया। मैं कमरे में बैठा रहा।
मुझे याद है, वहाँ बहुत शान्ति थी। वैसी शान्ति नहीं जो खाली घरों में होती है, बल्कि वैसी जो उन कमरों में बस जाती है जहाँ कोई बहुत समय से अकेला रह रहा हो।
जब वह चाय लेकर आई, तो कुछ देर तक हम दोनों लगभग चुप रहे। बाहर कहीं दूर बारिश हो रही थी।
फिर उसने पूछा —
“आप यहाँ नए आए हैं?”
मैंने कहा —
“जी।”
“अकेले रहते हैं?”
“हाँ।”
उसने सिर हिलाया। जैसे यह बात वह पहले से जानती हो।
फिर थोड़ी देर बाद उसने कहा —
“अकेले रहने की आदत शुरू में कठिन लगती है। बाद में उसी के बिना कठिनाई होने लगती है।”
उस समय मैं इस वाक्य का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाया था।
मैंने उसकी ओर देखा। वह खिड़की के बाहर देख रही थी। उसके चेहरे पर कोई विशेष उदासी नहीं थी, लेकिन एक ऐसी थकान थी जो शायद वर्षों में धीरे-धीरे मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा बन जाती है।
हमने कुछ और साधारण बातें कीं — शहर, मौसम, मकान-मालिक की शिकायतें।
फिर मैं उठकर चला आया।
बस इतना ही।
उसके बाद हमारे बीच फिर कभी कोई बातचीत नहीं हुई।
कभी-कभी सीढ़ियों पर सामना हो जाता। वह हल्के से मुस्कुरा देती। मैं भी। फिर हम अपने-अपने कमरों में चले जाते।
लेकिन विचित्र बात यह है कि उसी छोटे-से परिचय ने धीरे-धीरे मेरे भीतर एक स्थायी जगह बना ली।
मैं कई बार अपने कमरे में बैठा उसके बारे में सोचता रहता, बिना किसी स्पष्ट कारण के।
असल में मैं उसके जीवन के बारे में लगभग कुछ नहीं जानता था। शायद इसी कारण मेरी कल्पना उसके चारों ओर एक दूसरा जीवन बनाती रहती।
मुझे लगता, वह देर रात तक जागती होगी।
कभी पुराने पत्र पढ़ती होगी।
कभी संगीत सुनते-सुनते अचानक कहीं खो जाती होगी।
अब समझ पाता हूँ कि हम कई बार किसी व्यक्ति से नहीं, उसके चारों ओर फैले हुए रहस्य से आकर्षित होते हैं।
फिर एक दिन वह चली गई।
मकान-मालिक ने सहज ढंग से बताया कि उसने दूसरा घर ले लिया है।
मैंने सिर हिला दिया।
उस समय मुझे कोई विशेष दुख नहीं हुआ। बल्कि कुछ दिनों तक तो मैं उसे लगभग भूल ही गया।
लेकिन स्मृति का काम तत्काल नहीं होता।
बहुत बाद में, वर्षों बाद, अचानक किसी बरसाती शाम, किसी कमरे में चाय की गन्ध के बीच, वह स्त्री फिर याद आ जाती।
और मुझे लगता — मेरे जीवन के सबसे गहरे प्रभाव उन लोगों ने छोड़े, जिनसे मेरी सबसे कम बातें हुईं।
अब समझता हूँ कि अनुपस्थिति का प्रेम शायद यही होता है।
जब कोई मनुष्य हमारे जीवन में लगभग आया भी न हो, फिर भी उसके न होने से भीतर एक हल्की-सी खाली जगह बनी रहे।
एक ऐसा कमरा, जहाँ कभी कुछ घटा नहीं
फिर भी जिसे स्मृति बार-बार खोलकर देखती रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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