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Sunday, 24 May 2026

बारिश में कम झूठे लोग

 उस वर्ष बारिश कुछ अधिक ही हुई थी। शहर की गलियों में नमी कई दिनों तक बनी रहती, और पुराने मकानों की दीवारों से चूने की गन्ध उठती रहती थी। उन्हीं दिनों मैं लगभग हर शाम नगर पुस्तकालय जाने लगा था।

यह कहना कठिन है कि मैं वहाँ किताबों के लिए जाता था या अपने कमरे की चुप्पी से बचने के लिए। मनुष्य अक्सर अपने वास्तविक कारणों को बहुत बाद में समझता है। उस समय मुझे केवल इतना मालूम था कि शाम ढलते ही भीतर एक अस्पष्ट-सी बेचैनी शुरू हो जाती, और मैं बिना सोचे सड़क पर निकल पड़ता।

पुस्तकालय बहुत पुराना था। लकड़ी की लंबी मेज़ें, ऊँची खिड़कियाँ और एक ऐसी गम्भीर शान्ति, जिसमें कुर्सी खिसकाने की आवाज़ भी असभ्य लगती थी। वहीं मैंने उसे पहली बार देखा।

वह खिड़की के पास बैठी थी। बाहर बारिश हो रही थी और शीशे पर पानी की धारियाँ लगातार फिसल रही थीं। उसके सामने एक खुली हुई पुस्तक थी, लेकिन वह पढ़ नहीं रही थी। उसकी दृष्टि कहीं दूर थी — ऐसी दृष्टि जो किसी वस्तु को नहीं, अपने भीतर चल रही किसी बात को देख रही हो।

पहली नज़र में उसमें कुछ विशेष नहीं था। चेहरा साधारण था, वस्त्र भी। लेकिन उसके आसपास एक अजीब प्रकार की अनुपस्थिति थी। जैसे वह जहाँ बैठी हो, वहाँ उसका पूरा अस्तित्व उपस्थित न हो।

मैंने उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया, फिर भी अगले दिन पुस्तकालय पहुँचते ही मेरी आँखें अनायास उसी खिड़की की ओर चली गईं। वह वहाँ थी।

धीरे-धीरे यह एक आदत बन गई।

कुछ सप्ताह बाद परिचय हुआ। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपना नाम बताया। मुझे दो बार पूछना पड़ा। वह मुस्कुराई नहीं, केवल हल्का-सा सिर हिलाया, मानो उसे पहले से मालूम हो कि लोग उसके शब्द ठीक से सुन नहीं पाते।

हमारी बातचीतें अत्यन्त साधारण थीं। किताबें, मौसम, शहर की भीड़, कभी-कभी संगीत। लेकिन उन बातों के बीच छोटे-छोटे मौन आते थे, और वही मौन मुझे विचलित करते थे।

कई बार मुझे लगता, वह मुझसे नहीं, अपने अकेलेपन से बात कर रही है।

एक शाम पुस्तकालय जल्दी बन्द हो गया। बाहर तेज़ बारिश थी। हम दोनों बरामदे में खड़े रहे। सड़क पर पानी भर चुका था और पीली बत्तियाँ उसमें काँप रही थीं।

“आप प्रतीक्षा करेंगे?” उसने पूछा।

“किसकी?”

“बारिश रुकने की।”

मैंने कहा, “शायद।”

वह कुछ क्षण चुप रही। फिर बिना मेरी ओर देखे बोली —

“मुझे बारिश में चलना अच्छा लगता है। इसमें लोग थोड़े कम झूठे लगते हैं।”

उसका यह वाक्य मुझे कई दिनों तक याद रहा।

अजीब बात थी — उसने मुझसे कोई गहरी बात कभी नहीं कही, लेकिन उसके साधारण वाक्य भी मेरे भीतर बहुत देर तक गूँजते रहते। शायद इसलिए कि मैं उन्हें अपने अर्थ देता रहता था।

धीरे-धीरे मैंने अपने भीतर एक परिवर्तन महसूस किया। मैं उसके आने-जाने के समय याद रखने लगा। पुस्तकालय में उसकी कुर्सी खाली दिखती तो अनावश्यक निराशा होती। यदि वह किसी दिन कुछ अधिक प्रसन्न दिखाई देती, तो पूरा दिन हल्का लगने लगता।

यह प्रेम था या नहीं, मैं नहीं कह सकता।

लेकिन इतना निश्चित है कि मनुष्य का मानसिक संतुलन बहुत सूक्ष्म चीज़ों पर निर्भर करता है। किसी की उपस्थिति धीरे-धीरे हमारे भीतर व्यवस्था बना देती है, और फिर हम उसे आवश्यकता समझने लगते हैं।

एक दिन उसने अचानक पूछा 

“आप हमेशा इतने चुप क्यों रहते हैं?”

मैंने उत्तर देना चाहा, लेकिन उस क्षण मुझे स्वयं समझ नहीं आया कि मैं वास्तव में चुप क्यों रहता हूँ।

शायद इसलिए कि जो बातें सबसे अधिक सच्ची होती हैं, उन्हें शब्दों में कहना लगभग असम्भव होता है।

उसने मेरी चुप्पी को असहजता नहीं समझा। केवल मेज़ पर उँगली से वृत्त बनाती रही।

उसकी उँगलियाँ बहुत पतली थीं। उस समय न जाने क्यों मुझे लगा कि वह भीतर से अत्यन्त थकी हुई स्त्री है। हालाँकि उसकी आयु तीस से अधिक नहीं होगी।

कुछ दिनों बाद वह पुस्तकालय आना बन्द कर दिया।

पहले दिन मुझे लगा, शायद अस्वस्थ होगी। फिर एक सप्ताह बीता। फिर दो।

मैंने किसी से पूछा नहीं। मनुष्य जिन लोगों के बारे में सबसे अधिक जानना चाहता है, उन्हीं के विषय में प्रश्न पूछने से डरता है।

एक महीने बाद पुस्तकालय के वृद्ध कर्मचारी ने अनायास बताया कि उसका विवाह हो गया है और वह दूसरे शहर चली गई है।

उसने यह बात इतनी साधारण ढंग से कही जैसे कोई पुस्तक अपनी जगह बदल दी गई हो।

मैंने सिर हिला दिया। उस समय मुझे कोई विशेष दुख नहीं हुआ। बल्कि एक अजीब शान्ति महसूस हुई। जैसे भीतर पहले से मालूम था कि यह होना ही था।

लेकिन उसके बाद कई महीनों तक बारिश होते ही मेरे भीतर अस्पष्ट उदासी भर जाती।

मैं सड़क पर चलते लोगों को देखता और सोचता — हम सब एक-दूसरे के जीवन में कितनी क्षणिक देर के लिए आते हैं, फिर भी कितनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं।

कभी-कभी अब भी पुस्तकालय जाते समय अनायास मेरी दृष्टि उसी खिड़की की ओर उठ जाती है। वहाँ अब कोई और बैठता है।

लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि उस कुर्सी पर अभी भी उसकी चुप्पी बची हुई है।

और शायद प्रेम अन्ततः यही है 
किसी मनुष्य से अधिक, उसकी अनुपस्थिति की आदत हो जाना।

मुकेश ,,,,,,,,,


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