एक मासूम प्रेमी
वह प्रेम में
वैसा ही था
जैसे कोई बच्चा पहली बार
समुद्र देखता है।
उसे नहीं मालूम था
कि लहरें
सिर्फ़ सुंदर नहीं होतीं,
वे डुबो भी सकती हैं।
वह लड़की से
बहुत साधारण बातों में प्रेम करता था।
उसके बोलते समय
कुछ शब्दों का धीरे हो जाना,
सीढ़ियाँ उतरते हुए
दुपट्टे को सँभालना,
हँसने के बाद
अचानक चुप हो जाना।
उसे लगता था
यही प्रेम है
किसी की छोटी-छोटी आदतों को
दुनिया की सबसे बड़ी घटना की तरह
देखते रहना।
वह अक्सर
उसके लिए किताबों में पत्तियाँ दबा देता,
चाय पीते समय
कप के किनारे पर उँगली घुमाता रहता,
और जब लड़की सामने होती
तो उसकी सारी समझदारी
धीरे-धीरे गायब हो जाती।
उसके मित्र हँसते थे।
कहते
“तुम बहुत जल्दी दुखी हो जाओगे।”
लेकिन वह मुस्कुरा देता।
जैसे दुख भी
उसे प्रेम का ही एक रूप लगता हो।
एक शाम
वे दोनों नदी के किनारे बैठे थे।
सूरज नीचे उतर रहा था,
और पानी पर
पीली रोशनी तैर रही थी।
लड़की
बहुत देर तक कुछ नहीं बोली।
फिर अचानक उसने कहा
“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”
वह उत्तर नहीं दे पाया।
असल में
उसके भीतर उस समय
इतनी आवाज़ें थीं
कि कोई एक वाक्य चुनना कठिन था।
वह कहना चाहता था
कि जब तुम पास होती हो
तो दुनिया थोड़ी कम कठोर लगती है।
कि तुम्हारे जाने के बाद
कुर्सियाँ भी खाली नहीं,
उदास दिखाई देती हैं।
कि तुम्हारी आवाज़
धीरे-धीरे मेरी आदत बनती जा रही है।
लेकिन उसने सिर्फ़ इतना कहा
“ऐसे ही।”
लड़की हँस दी।
उसे क्या पता था
कि कुछ लोग
अपने सबसे गहरे प्रेम को भी
बहुत साधारण शब्दों में छिपा लेते हैं।
समय बीतता गया।
एक दिन
लड़की चली गई।
कोई बड़ा कारण नहीं था।
ज़िंदगी
अक्सर बिना कारण भी
लोगों को अलग कर देती है।
उसके बाद
वह लड़का पहले जैसा नहीं रहा।
लेकिन अजीब बात यह थी
कि उसके भीतर
प्रेम खत्म नहीं हुआ।
वह अब भी
बारिश देखकर मुस्कुरा देता था,
अब भी किताबों में सूखे फूल रख देता,
अब भी किसी की आवाज़ में
धीमी उदासी सुन लेता था।
जैसे प्रेम
उसके लिए किसी व्यक्ति से ज़्यादा
एक देखने का तरीका था।
बहुत वर्षों बाद
जब उसने आईने में अपने सफ़ेद बाल देखे,
तो अचानक उसे
उस लड़की की हँसी याद आई।
और वह हल्का-सा मुस्कुराया।
कुछ प्रेम
मनुष्य के साथ नहीं रहते,
लेकिन उसकी आत्मा की बनावट बदल देते हैं।
वह उन्हीं प्रेमों में से एक था।
— मुकेश
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