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Sunday, 24 May 2026

अंटार्कटिका में एक कमरा

 अंटार्कटिका में एक कमरा

एक दिन
मुझे अचानक लगा
कि मैं बहुत दूर चला आया हूँ।

इतना दूर
कि पृथ्वी भी अब
पहचान में नहीं आती।

जब मैंने बाहर देखा,
तो हर तरफ़ सिर्फ़ सफ़ेदी थी।

बर्फ़,
हवा,
और एक ऐसा सन्नाटा
जिसमें अपनी धड़कन भी
अजनबी लगने लगे।

किसी ने कहा 

“यह अंटार्कटिका है।”

लेकिन वह जगह
मुझे किसी भूगोल की किताब से ज़्यादा
मनुष्य के भीतर का कोई प्रदेश लगी।

मैं एक छोटे-से स्टेशन में ठहरा था।

लोहे की दीवारें,
संकीर्ण बिस्तर,
थर्मस में ठंडी होती कॉफ़ी,
और एक पीली रोशनी वाला लैम्प
जो हर समय जलता रहता था।

वहाँ रात और दिन
ठीक से अलग नहीं होते थे।

समय
घड़ी से नहीं,
थकान से समझ में आता था।

बाहर हवा चलती,
तो पूरी इमारत काँपने लगती।

ऐसा लगता
जैसे बर्फ़ नहीं,
पूरा ब्रह्मांड
धीरे-धीरे खिसक रहा हो।

मैंने खिड़की से देखा 

दूर
एक आदमी अकेला चल रहा था।

उसकी पीठ पर बर्फ़ जम रही थी,
लेकिन वह रुका नहीं।

उस क्षण
मुझे पहली बार समझ में आया

कि पृथ्वी पर
कुछ जगहें ऐसी भी हैं
जहाँ मनुष्य
जीने के लिए नहीं,
सिर्फ़ उपस्थित रहने के लिए जाता है।

उस रात
मैं बहुत देर तक जागता रहा।

कमरे में हीटर की आवाज़ थी,
और बाहर
हज़ारों वर्षों पुरानी बर्फ़।

मैंने सोचा 

इन हिमखंडों ने
कितने युग देखे होंगे।

कितनी सभ्यताएँ आई होंगी,
कितने युद्ध हुए होंगे,
कितने प्रेम-पत्र लिखे गए होंगे,
कितने लोग
अपने छोटे-छोटे दुखों में टूटे होंगे 

और यहाँ,
इस सफ़ेद महाद्वीप में,
कुछ भी नहीं बदला।

बर्फ़
वैसी ही रही।

हवा
वैसी ही रही।

मानो पृथ्वी ने
अपनी सारी स्मृतियाँ
यहीं आकर जमा कर दी हों।

तभी अचानक
मुझे अपने कमरे की याद आई।

वही पुरानी मेज़,
वही किताबें,
वही शहर की रात।

और मुझे लगा 

मनुष्य चाहे
कितनी भी दूर चला जाए,
अपने भीतर
एक छोटा-सा कमरा साथ लेकर चलता है।

एक ऐसा कमरा
जहाँ हमेशा
कोई पुराना लैम्प जल रहा होता है।

और शायद
पूरी पृथ्वी पर
सबसे ठंडी जगह भी

उस कमरे की हल्की उदासी से
ज़्यादा ठंडी नहीं हो सकती।

— मुकेश

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