कमरे में बची हुई आवाज़ें
कल देर रात
जब पूरा घर सो चुका था,
मैंने सुना —
कमरे में
एक बहुत धीमी आवाज़ चल रही है।
पहले लगा
शायद पंखे की चरमराहट होगी,
या बाहर से आती हवा।
लेकिन नहीं।
वह आवाज़
कुछ और थी।
जैसे चीज़ें
धीरे-धीरे आपस में बात कर रही हों।
मेज़ पर रखा गिलास
दीवार से टिके कैलेंडर से कुछ कह रहा था,
पुरानी घड़ी
अपनी थकी हुई टिक-टिक में
कोई पुराना दुख दोहरा रही थी।
किताबों की अलमारी
अजीब चुप्पी में खड़ी थी,
लेकिन उसकी लकड़ी के भीतर
समय की बहुत धीमी कराह थी।
मैं देर तक सुनता रहा।
फिर अचानक लगा
शायद हर वस्तु
अपने भीतर
उन दिनों की आवाज़ें बचाकर रखती है
जिन्हें मनुष्य भूल चुका होता है।
इस कुर्सी ने
कितने लोगों को बैठते देखा होगा।
किसी ने यहाँ
चिट्ठियाँ लिखी होंगी,
किसी ने रोते हुए सिर झुकाया होगा,
किसी ने पहली बार
किसी का नाम
धीरे से दोहराया होगा।
और अब
वे सब लोग
कहीं नहीं हैं।
लेकिन उनकी आदतें,
उनके स्पर्श,
उनकी थकान,
उनकी प्रतीक्षा —
शायद अभी भी
इन वस्तुओं के भीतर
हल्की गर्मी की तरह बची हुई हैं।
मैंने हाथ बढ़ाकर
मेज़ को छुआ।
लकड़ी ठंडी थी,
पर पता नहीं क्यों
ऐसा लगा
जैसे किसी बहुत पुराने परिचित का हाथ छू लिया हो।
बाहर सड़क पर
एक मोटर-साइकिल गुज़री,
फिर दूर कहीं कुत्ते भौंके,
फिर शहर वापस अपनी रात में डूब गया।
लेकिन मेरे कमरे में
समय अब भी ठहरा हुआ था।
मैंने घड़ी की तरफ़ देखा।
उसकी सुइयाँ चल रही थीं,
पर उनमें
जीवन से ज़्यादा
कर्तव्य दिखाई दे रहा था।
जैसे वे भी
सिर्फ़ आदत से आगे बढ़ रही हों।
तभी मुझे लगा —
मनुष्य शायद
अपने घरों में नहीं रहता।
वह धीरे-धीरे
अपनी वस्तुओं में बसने लगता है।
अपने तकियों में,
किताबों के मोड़े हुए पन्नों में,
दरवाज़ों के हैंडल पर,
पुराने कपड़ों की गन्ध में।
और एक दिन
जब वह नहीं रहता,
तो उसकी अनुपस्थिति
कमरे में नहीं,
वस्तुओं के व्यवहार में दिखाई देती है।
वे अचानक
बहुत शांत हो जाती हैं।
बहुत बूढ़ी।
मैं देर तक जागता रहा।
फिर बत्ती बुझाकर लेट गया।
अँधेरे में भी
मुझे साफ़ महसूस हो रहा था
कमरा अभी सोया नहीं है।
वह अब भी
धीरे-धीरे
मेरे होने को याद कर रहा है।
— मुकेश
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