उस शहर में
लोग अपने सपने
रात को चार्जिंग पर लगाकर सोते थे।
तकियों के पास
छोटे-छोटे उपकरण रखे रहते,
जिनसे नीली रोशनी निकलती रहती थी।
कहा जाता था
अब प्राकृतिक सपने भरोसेमंद नहीं रहे।
वे बहुत अव्यवस्थित होते थे
कभी बचपन दिखा देते,
कभी मृत्यु,
कभी ऐसा प्रेम
जिसे सुबह उठकर स्वीकार करना मुश्किल हो।
इसलिए सरकार ने
“नियंत्रित स्वप्न योजना” शुरू की थी।
अब लोग
ऐप से सपने चुनते थे :
“हल्का रोमांस”
“समुद्र किनारे शांति”
“सफलता और आत्मविश्वास”
“मृत प्रियजनों से सुरक्षित मुलाक़ात”
प्रीमियम संस्करण में
अपना पसंदीदा मौसम भी चुना जा सकता था।
धीरे-धीरे
पूरे शहर की नींद
बहुत व्यवस्थित हो गई।
लोग सुबह उठते
और कहते :
“कल का सपना शानदार था।
4.8 स्टार।”
लेकिन समस्या
कुछ महीनों बाद शुरू हुई।
लोगों ने
अनायास रोना बन्द कर दिया।
कवियों की भाषा
चिकनी और निर्जीव होने लगी।
चित्रकार
सिर्फ़ वही रंग बनाने लगे
जो एल्गोरिथ्म सुझाता था।
और बच्चों ने
नींद में बोलना लगभग छोड़ दिया।
डॉक्टरों ने जाँच की।
वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट जारी की :
“मानव मस्तिष्क से
अव्यवस्थित अँधेरा
धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।”
शहर खुश था।
सिर्फ़ एक बूढ़ी औरत
हर रात
अपना स्वप्न-यंत्र बन्द कर देती।
वह कहती :
“मुझे अपने पुराने डर वापस चाहिए।”
लोग उसका मज़ाक उड़ाते।
फिर एक रात
पूरे शहर का सर्वर क्रैश हो गया।
करोड़ों लोग
बिना नियंत्रित सपनों के सो गए।
और उसी रात
दुनिया भर में
अजीब दृश्य दिखाई दिए।
लोगों ने
अपने मृत पिता देखे,
बंद पड़े घर,
टूटी हुई साइकिलें,
अधूरे चुंबन,
और बचपन के वे कमरे
जिन्हें वे दशकों पहले भूल चुके थे।
सुबह
शहर असामान्य रूप से शांत था।
बहुत से लोग
उठते ही रो पड़े।
कुछ ने नौकरी छोड़ दी।
कुछ पुराने प्रेमियों को फ़ोन करने लगे।
कुछ घंटों तक
आईने में खुद को देखते रहे।
और पहली बार
वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया :
मनुष्य
सिर्फ़ सुंदर सपनों से जीवित नहीं रहता।
उसे कभी-कभी
बिखर जाने वाले,
अनियंत्रित,
डरावने सपने भी चाहिए —
ताकि वह याद रख सके
कि उसकी आत्मा
अब भी मशीन नहीं बनी।
— मुकेश
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