कल रात
मैंने देखा
कि मेरी मेज़ पर रखा लैम्प
धीरे-धीरे बूढ़ा हो रहा है।
उसकी रोशनी
पहले जैसी नहीं रही थी।
वह अब
कमरे को उजाला कम,
याद ज़्यादा करती थी।
मैंने किताब खोली,
तो शब्द
थके हुए यात्रियों की तरह लगे
जैसे बहुत दूर से आए हों
और अब
थोड़ी देर बैठना चाहते हों।
कमरे में
काग़ज़, धूल
और हल्की-सी जली हुई बिजली की गन्ध थी।
बाहर
पूरा शहर जाग रहा था।
खिड़कियों में रोशनियाँ थीं,
लिफ़्टें ऊपर-नीचे जा रही थीं,
कहीं कोई हँस रहा था,
कहीं कोई
अभी-अभी प्रेम से बाहर निकला था।
लेकिन मेरे कमरे में
समय अलग गति से चल रहा था।
यहाँ
हर चीज़
धीरे-धीरे पुरानी हो रही थी —
लकड़ी की मेज़,
कुर्सी का कपड़ा,
दीवार की नमी,
यहाँ तक कि
आईने में दिखाई देता चेहरा भी।
मैंने अचानक सोचा :
क्या वस्तुएँ भी
हमें याद रखती हैं?
क्या यह लैम्प जानता है
कि मैंने इसकी रोशनी में
कितनी रातें काटी हैं?
क्या मेज़ को याद है
मेरे हाथों का वज़न?
क्या किताबों ने
मेरी चुप्पियों को
अपने भीतर कहीं रख लिया है?
तभी
बत्ती हल्की-सी झपकी।
कुछ क्षणों के लिए
कमरा अँधेरे में डूब गया।
और उस छोटे-से अँधेरे में
मुझे साफ़ महसूस हुआ
वस्तुएँ
हमसे कम अकेली नहीं होतीं।
वे भी
वर्षों तक
एक ही मनुष्य के साथ रहकर
उसकी आदत सीख जाती हैं।
और जब वह चला जाता है,
तो बहुत दिनों तक
उसी की प्रतीक्षा करती रहती हैं।
बत्ती फिर जल उठी।
कमरा वैसा ही था।
मेज़, किताबें, लैम्प — सब अपनी जगह।
लेकिन अब
उन सबमें
मुझे एक हल्की उदासी दिखाई दे रही थी।
जैसे वे पहले से जानती हों
कि एक दिन
मैं भी
किसी पुराने शब्द की तरह
धीरे-धीरे
इस कमरे से गायब हो जाऊँगा।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment