गर्म लू के हस्ताक्षर
गर्म लू चली
जैसे आग ने
हवा का रूप धर लिया हो,
और हर स्पर्श
एक चेतावनी बन गया हो।
उसने समय की स्लेट पर
स्याही नहीं,
ताप से लिखा
ऐसे अक्षर
जो दिखते नहीं,
पर जलते रहते हैं भीतर।
धूप की धार ने
सड़कों को पिघला दिया,
पेड़ों की छाँव भी
अपने अर्थ खो बैठी—
जैसे आश्रय भी
अब आश्रय न रहा हो।
ये हस्ताक्षर
न कोमल हैं, न क्षणिक
इनमें एक कठोर सच्चाई है,
कि जीवन कभी-कभी
सिर्फ़ सहने का नाम है।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो आँखें झपक गईं—
पर त्वचा ने
हर शब्द याद रख लिया।
गर्म लू के हस्ताक्षर
कहते हैं
जो तपता है,
वही आकार लेता है।
और जो झुलसता है,
वही
अपने भीतर
एक नई सहनशीलता लिखता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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