सांझ की हवा के हस्ताक्षर
सांझ की हवा आई
दिन और रात के बीच
एक धीमी समझौते की तरह।
उसने समय की स्लेट पर
न उजाले से लिखा,
न अँधेरे से
बस धुँधलके की स्याही में
कुछ अधूरे वाक्य छोड़ दिए।
पंछियों की लौटती कतारों में
उसने अपनी लकीरें खींचीं,
और आसमान के रंगों में
धीरे-धीरे
अपना नाम घोल दिया।
ये हस्ताक्षर
पूरे नहीं होते—
जैसे कोई बात
कहते-कहते
रुक जाए होंठों पर।
मैंने उन्हें पढ़ना चाहा,
तो लगा
ये शब्द नहीं,
एक विदाई है
जो हर दिन दोहराई जाती है।
सांझ की हवा के हस्ताक्षर
कहते हैं
हर अंत में
एक शांत शुरुआत छुपी होती है।
और जो ढल रहा है,
वही
किसी और क्षितिज पर
उग भी रहा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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