दूसरा तमाशा
मैं भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा था,
जैसे हमेशा खड़ा रहता हूँ।
न पूरी तरह शामिल,
न पूरी तरह अलग।
लोग चीख रहे थे,
बहस कर रहे थे,
देश बचा रहे थे,
धर्म बचा रहे थे,
अपनी-अपनी स्क्रीन पर
क्रांति का लाइव प्रसारण कर रहे थे।
और मैं
बस देख रहा था।
पहले मुझे लगता था
कि दुनिया बदल रही है।
अब लगता है
दुनिया सिर्फ़ अपना मंच बदल रही है।
पहले चौपालों में तमाशे होते थे,
अब टाइमलाइन पर होते हैं।
पहले लोग आँखों से देखते थे,
अब नोटिफ़िकेशन से देखते हैं।
हर आदमी
अपने भीतर एक छोटा-सा चैनल लिए घूम रहा है,
जहाँ
वह खुद ही एंकर है,
खुद ही दर्शक,
और खुद ही
अपनी राय का भक्त।
किसी की मौत
“ट्रेंड” बन जाती है,
किसी की बर्बादी
“कंटेंट”।
रोते हुए आदमी के सामने भी
लोग पहले कैमरा सीधा करते हैं,
फिर संवेदना।
मैं यह सब देखता हूँ
तो कभी-कभी लगता है—
असल तमाशा
घटनाएँ नहीं हैं,
हम हैं।
हमारी बेचैनियाँ हैं,
हमारी भूख है
हर चीज़ को
तुरंत अर्थ,
तुरंत प्रतिक्रिया
और तुरंत मनोरंजन में बदल देने की।
हम अब जीते कम हैं,
रिकॉर्ड ज़्यादा करते हैं।
किसी पहाड़ पर जाकर भी
पहाड़ नहीं देखते,
बस यह सोचते हैं
कि कौन-सा एंगल
ज़्यादा ‘एस्थेटिक’ लगेगा।
प्रेम भी अब
कहानियों से ज़्यादा
स्टेटस अपडेट में मिलता है।
दुख भी
पोस्ट होने के बाद ही
सच माना जाता है।
और इन सबके बीच
मैं अपने भीतर
एक अजीब-सा सन्नाटा लिए खड़ा हूँ।
कभी-कभी लगता है
मैं भी कोई इंसान नहीं,
बस एक दूसरा तमाशा हूँ
जो दुनिया को
थोड़ी दूरी से देख रहा है,
जैसे नदी किनारे बैठा कोई साधु
बहते हुए शवों और फूलों को
एक ही शांति से देखता हो।
मुझे अब
बहुत-सी बातों पर क्रोध नहीं आता।
सिर्फ़ विस्मय होता है।
कि मनुष्य
इतना बुद्धिमान होकर भी
अपने ही बनाए हुए शोर में
धीरे-धीरे डूबता जा रहा है।
और शायद
साक्षी भाव का अर्थ यही है—
कि तुम दुनिया से भागो नहीं,
मगर
उसके हर उन्माद में
अपना होश भी मत खो दो।
इसलिए
मैं भीड़ में रहकर भी
थोड़ा किनारे खड़ा रहता हूँ।
लोग समझते हैं
मैं उदास हूँ।
नहीं
मैं बस
दूसरा तमाशा हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,,
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