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Wednesday, 20 May 2026

कुएँ की जगत अब सिर्फ़ पत्थर नहीं रही

 कुएँ की जगत अब

सिर्फ़ पत्थर नहीं रही 


वह एक वृत्त है

जहाँ विचार

धीरे-धीरे अपने ही केंद्र में लौट आते हैं।


पानी में गिरा चाँद

अब चाँद नहीं लगता,

वह मन की वह धड़कन है

जो स्वयं को सुनने लगी है।


मैं

अब कुएँ में नहीं हूँ —

न कुआँ मेरे बाहर है।


यह दूरी

किसी नक्शे में नहीं मिलती,

यह केवल

साँस और मौन के बीच

बची हुई जगह है।


मेंढक अब संसार नहीं देखता,

वह केवल कंपन है —

जिसे कोई नाम नहीं चाहिए।


साँप

भय नहीं है,

वह वह गति है

जो बिना आरंभ के चलती है।


गगरी की हल्की चमक

अब वस्तु नहीं —

स्मृति का जल है,

जो सूखता नहीं।


और मैं

कुएँ की तली में बैठा

यह समझने लगता हूँ 


कि गहराई कहीं बाहर नहीं,

वह केवल इतना है

कि मन

अपनी सतह को छोड़ दे।


और जब सतह छूट जाती है,

तो डूबना भी नहीं होता 


सिर्फ़ एक धीमा

विलय होता है

जहाँ प्रश्न

अपने ही उत्तर में

सो जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,

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