कुएँ की जगत से
एक चाँद बहता हुआ दिखाई देता है
जैसे पानी में नहीं,
किसी बहुत पुराने सपने में उतर आया हो।
पर वह भी
रात के अँधेरे में
बहुत थोड़ी देर के लिए ही टिकता है
फिर काँपकर
किसी अज्ञात गहराई में खो जाता है।
सूरज की किरणें भी
यहाँ कम ही पहुँचती हैं,
जैसे प्रकाश ने
इस जगह को पहचानने से इंकार कर दिया हो।
कभी-कभी
जी घबरा उठता है —
न बाहर की कमी से,
न भीतर के शोर से,
बल्कि इस बात से
कि यहाँ समय भी
पूरी तरह नहीं आता।
बस उसके टूटे हुए हिस्से
पानी पर तैरते रहते हैं
चाँद की तरह,
किरणों की तरह,
और कभी-कभी
अपनी ही धड़कन की तरह।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment