“साया जो मेरा नहीं था”
एक साया है—
जो मेरे साथ चलता है,
पर मैं जानता हूँ
वह मेरा नहीं है।
उसकी चाल अलग है,
मेरे कदमों से थोड़ा पीछे,
जैसे किसी और की याद
मेरे जीवन में भटक आई हो।
कभी वह किसी पुराने नाम की तरह
होंठों तक आता है,
पर आवाज़ नहीं बन पाता—
बस एक साया बनकर
मेरे आसपास ठहर जाता है।
मैंने उसे पहचानने की कोशिश की—
किसका है यह अक्स?
किसकी अधूरी कहानी
मेरे भीतर साँस ले रही है?
कभी लगता है
वह किसी और का दुख है,
जो मुझमें घर कर गया,
या कोई अनकहा रिश्ता
जो समय की दरारों में अटका रह गया।
वह साया
मुझसे कुछ माँगता नहीं,
पर हर पल
कुछ कहता रहता है—
बिना शब्दों के,
बिना आवाज़ के।
मैंने उसे हटाना चाहा,
तो वह और गहरा हो गया,
जैसे उसे हटाना
किसी और को मिटाना हो।
तब समझ में आया—
हर साया हमारा नहीं होता,
कुछ साये
हमारे हिस्से की दुनिया लेकर आते हैं।
और हम—
उन्हें पहचानें या न पहचानें,
उनके साथ जीते रहते हैं,
जैसे किसी और की कहानी
हमारी रगों में बह रही हो।
मुकेश --------
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