यादों से मुक्ति नहीं
यादों को
काटा नहीं जा सकता,
वे धागे नहीं हैं
जो उँगलियों से टूट जाएँ।
तोड़ भी नहीं सकता उन्हें
वे काँच नहीं
कि एक झटके में बिखर जाएँ,
और छूट भी नहीं सकतीं
वे रास्ते नहीं
जो पीछे मुड़कर बदल दिए जाएँ।
वे तो साये हैं—
मेरे भीतर उगते हुए,
मेरी हर रोशनी के साथ
लंबे होते हुए।
मैंने उन्हें
नाम देने की कोशिश की
कुछ को “खुशी”,
कुछ को “अफ़सोस”,
पर वे हर बार
इन शब्दों से बाहर निकल आईं।
कभी लगता है
उन्हें किसी कोने में रख दूँ,
जैसे पुरानी किताबें,
पर वे पन्नों से फिसलकर
मेरे वर्तमान में आ गिरती हैं।
वे मेरे साथ नहीं रहतीं
मैं उनके साथ रहता हूँ,
उनके बनाए हुए समय में,
जहाँ हर पल
एक अधूरा वाक्य है।
अजीब कैद है
न सलाखें दिखती हैं,
न दरवाज़ा,
पर बाहर जाने का रास्ता भी नहीं।
तब समझ आता है
यादों से छुटकारा नहीं होता,
बस उनके साथ जीना सीखना होता है।
वे साये हैं
जिन्हें मिटाया नहीं जा सकता,
पर जिनके साथ
चलना सीखा जा सकता है।
और शायद
यही स्वीकार
सबसे पहली मुक्ति है।
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