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Sunday, 3 May 2026

यादें जो साया बन गईं

 “यादें जो साया बन गईं”

कुछ यादें होती हैं
जो बीतती नहीं,
बस आकार बदल लेती हैं।

वे अब तस्वीर नहीं रहीं,
न आवाज़, न कोई पूरा चेहरा
बस एक धुंधला साया हैं
जो हर रोशनी के साथ
मेरे पास आ खड़ा होता है।

पुरानी गलियों से गुजरते हुए
अचानक लगता है
कोई मेरे साथ चल रहा है,
मैं मुड़ता हूँ
कोई नहीं होता,
सिवाय उस साये के
जो अतीत की उँगली थामे हुए है।

कुछ हँसी के टुकड़े हैं
जो अब सन्नाटे में गूंजते हैं,
कुछ अधूरे वाक्य
जो दीवारों पर टिके रहते हैं
और उन्हीं से बनता है
यह साया।

यह साया न डराता है,
न रोकता है
बस याद दिलाता है
कि जो चला गया
वह पूरी तरह गया नहीं।

कभी-कभी
यह साया इतना पास आ जाता है
कि मैं खुद को छू नहीं पाता,
और कभी इतना दूर
कि उसकी परछाईं भी धुँधली हो जाती है।

मैंने उसे मिटाने की कोशिश नहीं की
क्योंकि यह साया
मेरी हार नहीं,
मेरे होने का इतिहास है।

हर कदम पर
वह मेरे साथ नहीं चलता,
पर हर ठहराव पर
वह मेरा इंतज़ार करता है।

और तब समझ आता है
यादें खत्म नहीं होतीं,
वे बस
साया बनकर
हमारे साथ जीती रहती हैं।


मुकेश --------

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