बिना रोशनी का साया
आज
रोशनी नहीं है
न सूरज, न चाँद,
न कोई दीया
जो दीवारों को छू सके।
फिर भी
एक साया है।
मैंने सोचा था
साये रोशनी से जन्म लेते हैं,
पर यह साया
किस अँधेरे की कोख से निकला है?
यह मेरे साथ नहीं चलता,
न दीवारों पर टिकता है,
न ज़मीन पर गिरता है
यह सीधा
मेरे भीतर उतरता है,
जैसे कोई अनकहा वाक्य
जो शब्दों के बिना भी
पूरा हो जाता है।
मैंने आँखें बंद कीं
वह और साफ़ हो गया,
मैंने आँखें खोलीं
वह और गहरा।
अजीब विरोधाभास है
बिना रोशनी का साया
सबसे अधिक दिखाई देता है।
यह न आकार मांगता है,
न दिशा,
न समय
बस एक खाली जगह
जहाँ वह फैल सके।
शायद यही वह साया है
जिसे हम टालते रहते हैं
दिन के शोर में,
लोगों की भीड़ में,
अपने ही बहानों के पीछे।
पर जब सब कुछ बुझ जाता है,
तो यही साया
सबसे पहले बोलता है
धीरे से,
लगभग फुसफुसाकर
“मैं तुम्हारा अंधेरा नहीं,
तुम्हारी गहराई हूँ।”
और मैं
उस अंधेरे में बैठा
पहली बार समझता हूँ
हर साया
रोशनी का मोहताज नहीं होता,
कुछ साये
सच के होते हैं।
मुकेश --------
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