शाम चुपचाप मेरे घर का पता पूछती है,
रौशनी किसलिए दीवार जला पूछती है।
मैंने दरिया की तरह वक़्त को बहते देखा,
अब मेरी प्यास ही मुझसे वजह पूछती है।
धूल में दब गए कितने ही मोहब्बत के हुरूफ़,
ये हवा आज भी किसकी सदा पूछती है।
मैंने ख़ुद अपने ही ज़ख़्मों को छुपाया बरसों,
अब वही पीर मेरे दिल की दवा पूछती है।
कोई समझा ही नहीं दर्द की ख़ामोश ज़ुबाँ,
रूह हर मोड़ पे एहसास नया पूछती है।
मैंने तन्हाई को महफ़िल की तरह ओढ़ लिया,
अब ये दुनिया मेरे जीने की अदा पूछती है।
एक मुद्दत से मैं ख़ुद अपनी तलाशों में रहा,
आईना रोज़ मिरे होने का क्या पूछती है।
मक़ता:
'मुकेश' उम्र की धूप ने इतना तो सिखा ही दिया,
हर खुशी आने से पहले कुछ सज़ा पूछती है।
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