चौदहवाँ तमाशा - स्मृतियों का तमाशा
कुछ यादें
पुराने घरों की तरह होती हैं।
हम जानते हैं
वहाँ अब कोई नहीं रहता,
फिर भी
बार-बार लौट जाते हैं।
मनुष्य
कई बार वर्तमान में नहीं,
अपनी स्मृतियों के खंडहरों में जीता है।
और सबसे अजीब बात
उसे
वहीं सबसे ज़्यादा अपनापन मिलता है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment