भीतर की भीड़
(एक आन्तरिक एकालाप)
लोग अक्सर कहते हैं
तुम बहुत चुप रहते हो।
लेकिन वे नहीं जानते
कि चुप रहना
हमेशा खाली होना नहीं होता।
कुछ लोगों के भीतर
इतनी आवाज़ें होती हैं
कि वे बाहर बोल ही नहीं पाते।
एक स्मृति बोलती है,
एक पछतावा,
एक अधूरी इच्छा,
एक पुराना भय।
और इन सबके बीच
मनुष्य
धीरे-धीरे
अपनी ही आवाज़ पहचानना भूल जाता है।
मैंने कई बार
किसी से कुछ कहना चाहा,
लेकिन शब्द
भीतर ही कहीं उलझ गए।
जैसे
मन की सीढ़ियों पर
बहुत भीड़ हो
और कोई वाक्य
दरवाज़े तक पहुँच ही न पाए।
शायद इसलिए
कुछ लोग लिखते हैं।
क्योंकि बोलते समय
दुनिया बीच में आ जाती है,
लेकिन काग़ज़
तुम्हें बिना टोके सुनता है।
मैंने महसूस किया है
जो लोग बाहर से शांत होते हैं,
वे अक्सर
भीतर सबसे अधिक थके हुए होते हैं।
उन्हें हर समय
अपने ही विचारों के साथ रहना पड़ता है।
और विचार
वे भीड़ से ज़्यादा निर्दयी हो सकते हैं।
वे तुम्हें सोने नहीं देते,
तुम्हें अतीत में वापस ले जाते हैं,
तुमसे वही प्रश्न बार-बार पूछते हैं
जिनका कोई उत्तर नहीं होता।
धीरे-धीरे
मनुष्य
दुनिया से कम
अपने ही भीतर से हारने लगता है।
फिर एक दिन
वह बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है,
लेकिन भीतर
उसके कई हिस्से
बहुत पहले टूट चुके होते हैं।
और शायद
परिपक्वता का अर्थ
सिर्फ़ इतना है
कि आदमी
अपनी भीतर की भीड़ के साथ भी
शांत बैठना सीख जाए।
मुकेश ',,,,,,,,,
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