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Monday, 18 May 2026

मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, अष्टम मंत्र

 मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, अष्टम मंत्र

तप से सृष्टि का उत्क्रमण : मुण्डक उपनिषद् के अष्टम मंत्र में ब्रह्म, चेतना और विश्व-प्रपंच की क्रमिक अभिव्यक्ति का अद्वैत विश्लेषण

मूल मंत्र (संस्कृत)

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते
अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम्।।८।।

अन्वय

तपसा ब्रह्म चीयते, ततः अन्नम् अभिजायते, अन्नात् प्राणः, (ततः) मनः, (ततः) सत्यं, (ततः) लोकाः, कर्मसु अमृतम् (भवति)

संधि-विच्छेद

तपसा + चीयते + ब्रह्म + ततः + अन्नम् + अभिजायते
अन्नात् + प्राणः + मनः + सत्यं + लोकाः + कर्मसु + + अमृतम्

पद-पदार्थ

तपसा

· व्युत्पत्ति: “तप्धातु (ताप, तेज, साधना)

· व्याकरण: तृतीया एकवचन 

· शंकरार्थ: ज्ञानरूप तप (सृष्टि-विज्ञान)

· दार्शनिक अर्थ: सृजन-शक्ति, चेतन संकल्प 

चीयते

· धातु: “चि” (संचय)

· अर्थ: विकसित/उपचित होता है 

· शंकरार्थ: सृष्टि-शक्ति का उद्भव 

ब्रह्म

· व्युत्पत्ति: “बृह्” (विस्तार)

· अर्थ: सर्वव्यापक चेतना 

· शंकरार्थ: भूतयोनि अक्षर 

ततः

· क्रम-सूचक (causal sequence)

अन्नम्

· शंकरार्थ: अव्याकृत प्रकृति 

· दार्शनिक अर्थ: स्थूल जगत का बीज 

अभिजायते

· उत्पन्न होता है (विशेषतः प्रकट होना)

अन्नात् प्राणः

· जीवन-शक्ति का उद्भव 

· हिरण्यगर्भ का सूचक 

मनः

· संकल्प-विकल्पात्मक चेतना 

सत्यं

· पंचमहाभूत (आकाशादि)

लोकाः

· अस्तित्व के स्तर (भूरादि)

कर्मसु अमृतम्

· कर्मफल की स्थायित्वता 

भावार्थ

तप (ज्ञानरूप शक्ति) से ब्रह्म सृष्टि की ओर प्रवृत्त होता है। उससे अव्याकृत प्रकृति (अन्न) उत्पन्न होती है। उससे प्राण, फिर मन, फिर पंचमहाभूत, फिर विभिन्न लोक, और अंततः कर्म तथा उनके फल उत्पन्न होते हैंजो एक प्रकार से अमृत (दीर्घस्थायी) हैं।

 

 

शंकराचार्य भाष्य (यथावत्)

यदब्रहाण उत्पद्यमानं विश्वं तदनेन क्रमेणोत्पद्यते युगपद्बदरमुष्टिप्रक्षेपवदितिक्रमनियमविवक्षार्थोऽयं मन्त्र आरभ्यते। तपसा ज्ञानेनो'त्पत्तिविधिज्ञतया भूतयोन्यक्षरं ब्रह्म चीयत उपचीयत उत्पिपादयिषदिदं जगदःङकुरमिव बीजमुच्छूनतां गच्छति -पुत्रमिव पिता हर्षेण एवं सर्वज्ञतया *सृष्टिस्थितिसंहारशक्तिविज्ञानवत्तयोपचितात्ततो ब्रह्मणोऽन्नमद्यते भुज्यत इत्यन्नमव्याकृतं साधारणं संसारिणां व्याचिकीर्षितावस्थारूपेणाभिजायत उत्पद्यते ततश्चाव्याकृतादव्याचिकीर्षितावस्थावतोऽन्नात्प्राणो हिरण्यदात्माऽभिजायत इत्यनुषङ्गः तस्माच्च `प्राणान्मनो मनआख्यं सङ्कल्पविकल्पसंशयनिर्णयाद्यात्मकमभिजायते। ततोऽपि सङ्कल्याद्यात्मकान्मनसः सत्यं सत्याख्यमगकाशादिभूतपञ्चकमभिजायते तस्मात्सत्याख्याद्भूतपञ्चकादण्डक्रमेण सप्त लोका भूरादयः तेषु मनुष्यादिप्राणिवर्णाश्रमक्रमेण कर्माणि। कर्मसु निमित्तभूतेष्वमृतं कर्मजं फलम्
यावत्कर्माणि कल्पकोटिशतैरपि विनश्यन्ति तावत्फलं विनश्यतीत्यमृतम्

हिंदी अनुवाद (भाष्य)

शंकराचार्य कहते हैं कि सृष्टि एक क्रम में उत्पन्न होती है, कि एक साथ। तपयहाँ ज्ञान हैब्रह्म अपनी सृष्टि-शक्ति को विकसित करता है, जैसे बीज अंकुरित होता है। इससे अन्नअर्थात अव्याकृत प्रकृति उत्पन्न होती है। उससे प्राण (हिरण्यगर्भ), फिर मन, फिर पंचमहाभूत, फिर लोक उत्पन्न होते हैं। इन लोकों में जीव कर्म करते हैं और उन कर्मों के फल दीर्घकाल तक बने रहते हैंइसीलिए उन्हें अमृतकहा गया है।

दार्शनिक विश्लेषण

· क्रमिक सृष्टि (Cosmic Sequence): सृष्टि एक व्यवस्थित विकास है 

· तप = चेतन ऊर्जा 

· अन्न = पदार्थ का मूल रूप 

· प्राण मन सत्य = चेतना का विकास 

· कर्म = कारण-कार्य श्रृंखला का विस्तार 

अद्वैत: यह सब ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, वास्तविक परिवर्तन नहीं

 

 

शोधात्मक निबंध 

मुण्डक उपनिषद् का अष्टम मंत्र सृष्टि के प्रश्न को अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है। यहाँ सृष्टि को एक क्रमिक प्रक्रिया के रूप में देखा गया है, जो तपसे प्रारम्भ होती है। शंकराचार्य के अनुसार, यह तप कोई तपस्या नहीं, बल्कि ब्रह्म की ज्ञानात्मक सृजन-शक्ति है।

अन्नका अर्थ यहाँ भोजन नहीं, बल्कि अव्याकृत प्रकृति हैवह मूल अवस्था जिससे सम्पूर्ण जगत उत्पन्न होता है। इससे प्राणअर्थात जीवन-ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो आगे मनमें विकसित होती है। मन से सत्य”—अर्थात पंचमहाभूत उत्पन्न होते हैं, जो भौतिक जगत का आधार हैं।

इसके बाद लोकउत्पन्न होते हैंअस्तित्व के विभिन्न स्तर। इन लोकों में जीव कर्म करते हैं और उन कर्मों के फल दीर्घकाल तक बने रहते हैं। यही कर्मसु अमृतम्हैकर्मफल का दीर्घजीवन।

आधुनिक विज्ञान में भी हम एक समान क्रम देखते हैंऊर्जा से पदार्थ, पदार्थ से जीवन, जीवन से चेतना। यह उपनिषदिक दृष्टि के अत्यंत निकट है।

अद्वैत वेदान्त के अनुसार, यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, कि वास्तविक परिवर्तन। जैसे स्वप्न मन से उत्पन्न होता है, वैसे ही जगत ब्रह्म से।

अतः यह मंत्र केवल सृष्टि का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि समस्त अस्तित्व एक ही चेतन आधार से उत्पन्न होकर उसी में स्थित है।

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 मुकेश # 9999678683 

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