मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, सप्तम मंत्र
अक्षर ब्रह्म की कारणता और विश्वोत्पत्ति : ऊर्णनाभि-दृष्टान्त के माध्यम से अद्वैत सिद्धान्त का दार्शनिक प्रतिपादन
मूल मंत्र (संस्कृत)
यथोर्णनाभिः सृजते गृहते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ।।७।।
अन्वय
यथा ऊर्णनाभिः सृजते च गृहते च, यथा पृथिव्याम् ओषधयः सम्भवन्ति, यथा सतः पुरुषात् केश-लोमानि सम्भवन्ति, तथा अक्षरात् इह विश्वम् सम्भवति।
संधि-विच्छेद
यथा + ऊर्णनाभिः + सृजते + गृहते + च ।
यथा + पृथिव्याम् + ओषधयः + सम्भवन्ति ।
यथा + सतः + पुरुषात् + केश + लोमानि ।
तथा + अक्षरात् + सम्भवति + इह + विश्वम् ।
पद-पदार्थ
ऊर्णनाभिः — “ऊन” (सूत्र) + “नाभि”; मकड़ी।
शंकराचार्य: स्वयं से सृष्टि और लय करने वाला।
सृजते — उत्पन्न करता है; धातु “सृज्” (प्रसारण)।
गृहते — पुनः ग्रहण करता है; लय का सूचक।
पृथिव्याम् — पृथ्वी में; उपादान कारण का उदाहरण।
ओषधयः — वनस्पतियाँ; पृथ्वी से उत्पन्न।
सम्भवन्ति — उत्पन्न होती हैं।
सतः पुरुषात् — जीवित पुरुष से; चेतन कारण।
केशलोमानि — केश और रोम; स्वाभाविक उत्पत्ति।
अक्षरात् — अविनाशी ब्रह्म से।
विश्वम् — सम्पूर्ण जगत।
दार्शनिक निष्कर्ष: ब्रह्म ही जगत का उपादान और निमित्त कारण है।
भावार्थ
जैसे मकड़ी अपने ही शरीर से जाल उत्पन्न करती है और उसे वापस समेट लेती है; जैसे पृथ्वी से वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं; जैसे जीवित पुरुष से केश और रोम उत्पन्न होते हैं—वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत उस अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न होता है।
शंकराचार्य भाष्य (यथावत्)
भूतयोन्यक्षरमित्युक्तं तत्कथं भूतयोनित्वमित्युच्यते प्रसिद्धदृष्टान्तैः। यथा लोके प्रसिद्धम्। ऊर्णनाभिर्लूताकीटः किञ्जित्कारणान्तरमनपेक्ष्य स्वयमेव सृजते स्वशरीराव्यतिरिक्तानेव तन्तून्बहिः प्रसारयति पुनस्तानेव गृहृते च गृह्णति स्वात्मभावमेवाऽऽपदयति। यथा च पृथिव्यामोषधयो व्रीह्यादिस्थावरान्ता इत्यर्थः। स्वात्माव्यतिरिक्ता एव | प्रभवन्ति। यथा च सतो विद्यमानाज्जीवतः पुरुषात्केशलोमानि केशाश्च लोमानि च सम्भवन्ति विलक्षणानि। यथैते दृष्टान्तास्तथा विलक्षणं सलक्षणं च निमित्तान्तरानपेक्षाद्यथोक्तलक्षणादक्षरात्सम्भवति समुत्पद्यत इह *संसारमण्डले विश्वं समस्तं “जगत् । अनेकदृष्टान्तोपादानं तु सुखार्थप्रबोधनार्थम्। ।७।।
हिंदी अनुवाद (भाष्य)
शंकराचार्य कहते हैं—अक्षर ब्रह्म को भूतों का कारण बताया गया है, अब यह स्पष्ट करने के लिए कि वह कैसे कारण है, प्रसिद्ध दृष्टान्त दिए जाते हैं। जैसे मकड़ी बिना किसी अन्य कारण के अपने शरीर से जाल उत्पन्न करती है और फिर उसे समेटकर अपने में ही लीन कर लेती है। जैसे पृथ्वी से धान आदि वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जो उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे जीवित पुरुष से केश और रोम उत्पन्न होते हैं। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत उस अक्षर ब्रह्म से उत्पन्न होता है। अनेक दृष्टान्त केवल समझाने की सुविधा के लिए दिए गए हैं।
दार्शनिक विश्लेषण
(१) उपादान और निमित्त कारण
यहाँ ब्रह्म केवल सृष्टिकर्ता (निमित्त) ही नहीं, बल्कि सामग्री (उपादान) भी है।
(२) स्वयंसृष्टि (Self-manifestation)
सृष्टि बाह्य कारण से नहीं, ब्रह्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।
(३) कारण-कार्य अभेद
कार्य (जगत) कारण (ब्रह्म) से भिन्न नहीं—केवल नाम-रूप का भेद है।
(४) विवर्तवाद
जगत वास्तविक परिवर्तन नहीं, बल्कि आभास (appearance) है।
शोधात्मक निबंध (संक्षेप)
मुण्डक उपनिषद् का यह मंत्र सृष्टि के प्रश्न को अत्यंत गहन दार्शनिक धरातल पर ले जाता है। यहाँ सृष्टि को किसी बाह्य कर्ता द्वारा निर्मित वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्म की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया है।
शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म ही जगत का उपादान और निमित्त कारण है। ऊर्णनाभि (मकड़ी) का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि सृष्टि ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है और उसी में लीन होती है। यह अद्वैत सिद्धान्त का मूल है—कारण और कार्य में कोई वास्तविक भेद नहीं।
आधुनिक विज्ञान में भी “emergence” और “field theory” जैसी अवधारणाएँ यह संकेत करती हैं कि जटिल संरचनाएँ किसी गहरे आधार से उत्पन्न होती हैं। यह उपनिषदिक दृष्टि के निकट है।
अंततः, यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि सृष्टि कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्ति है—और ब्रह्म को जानना सृष्टि के मूल को जानना है।
मुकेश # 9999678683
No comments:
Post a Comment