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Sunday, 17 May 2026

मैं तुमसे कई गम्भीर विषयों पर बात करता था, और तुम सिर्फ़ सुनती रहती थीं।

 मैं तुमसे कई गम्भीर विषयों पर बात करता था, और तुम सिर्फ़ सुनती रहती थीं।

इतनी चुप, इतनी स्थिर, कि कई बार मुझे लगता—मैं किसी मनुष्य से नहीं, किसी पुरानी दीवार से संवाद कर रहा हूँ, जिस पर बारिश लगातार गिर रही हो।

वह दीवार न बारिश को रोकती थी, न उसे अपने भीतर पूरी तरह उतारती थी।
बस चुपचाप भीगती रहती थी।

और अजीब बात यह थी कि उसमें एक साथ दो इच्छाएँ दिखाई देती थीं
जैसे वह बादलों से कह रही हो :
“बरसो भी…”
और उसी क्षण बहुत धीमे से यह भी
“अब बस भी करो…”

तुम्हारी ख़ामोशी वैसी ही थी।
उसमें अस्वीकार नहीं था, पर कोई स्पष्ट स्वीकार भी नहीं।
मैं अपने भीतर के अँधेरे, अपने प्रश्न, अपनी बेचैनियाँ तुम्हारे सामने रखता जाता था
समय, मृत्यु, प्रेम, अकेलापन, स्मृति…
और तुम बस सुनती रहती थीं,
मानो शब्द तुम्हारे भीतर कहीं बहुत दूर जाकर गिर रहे हों।

कभी-कभी मुझे सचमुच लगता था कि मेरी बातें तुम्हें छूकर फिसल जाती हैं
ठीक वैसे जैसे बारिश किसी चिकनी दीवार पर गिरकर बह जाती है।
न कोई दरार बनती,
न कोई निशान।

लेकिन फिर, कुछ दिनों बाद अचानक तुम्हारे किसी छोटे-से वाक्य में मुझे अपनी ही कही हुई कोई बात लौटती दिखाई देती।
तब समझ में आता कि पानी दीवार में उतरा नहीं था—
बस उसकी सतह को धीरे-धीरे बदल रहा था।

हाँ, बारिश से वह दीवार थोड़ी साफ़-सुथरी और चमकदार ज़रूर हो उठी थी।
उस पर जमी पुरानी धूल धुल गई थी।
कुछ फीके रंग फिर से दिखने लगे थे।
शायद भीतर तक कुछ भी नहीं बदला था
पर सतह पर एक नमी आ गई थी,
जो धूप पड़ने पर हल्की चमक में बदल जाती थी।

और मुझे नहीं पता क्यों,
मुझे वही चमक पर्याप्त लगती थी।

मनुष्य हमेशा उत्तर नहीं चाहता।
कई बार वह सिर्फ़ यह चाहता है कि जब वह अपने भीतर की सबसे भारी बात कहे,
तो सामने कोई स्थिर बना रहे
बिना टोके, बिना समझाए, बिना निर्णय दिए।

तुम वैसी ही स्थिरता थीं।

तुम्हारे पास कोई बड़े शब्द नहीं थे,
पर तुम्हारी चुप्पी में एक जगह थी,
जहाँ मेरी आवाज़ जाकर थोड़ी देर ठहर सकती थी।

अब सोचता हूँ, शायद प्रेम हमेशा समझे जाने में नहीं होता।
कभी-कभी वह सिर्फ़ इस बात में होता है कि कोई तुम्हारे भीतर के मौसम को बिना बदले सह ले।
जैसे दीवार बारिश को सह लेती है
न पूरी तरह अपनाकर,
न पूरी तरह ठुकराकर।

और फिर एक दिन, जब बारिश रुक जाती है,
दीवार पहले से थोड़ी ज़्यादा चमकती हुई दिखाई देती है…
और बारिश को पहली बार एहसास होता है
कि उसका बरसना व्यर्थ नहीं था।


मुकेश ,,,,,,,

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