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Sunday, 17 May 2026

जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी, तब का मौसम अलग था।

 

जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी, तब का मौसम अलग था।

दिनों में एक अनकही चमक हुआ करती थी, जैसे हर सुबह किसी अदृश्य उत्सव की तैयारी में खुलती हो। धूप साधारण नहीं लगती थी—वह खिड़की पर आकर देर तक ठहरती थी, मानो उसे भी किसी उत्तर की प्रतीक्षा हो। उन दिनों दुनिया का हर छोटा दृश्य अर्थ से भरा लगता था। सड़क पर चलते हुए अचानक किसी गाने का सुनाई दे जाना, चाय के कप से उठती भाप, शाम के आसमान में बहुत धीरे-धीरे लौटते पक्षी—सब कुछ किसी गुप्त संवाद का हिस्सा लगता था।

तुमसे बात करना तब आदत नहीं, एक ऋतु था। दिन चाहे कितना भी थका हुआ क्यों न हो, तुम्हारे एक संदेश से उसके भीतर फिर से रोशनी जल उठती थी। कितनी अजीब बात है कि मनुष्य कभी-कभी किसी दूसरे की उपस्थिति में अपने ही जीवन को पहली बार महसूस करता है। जैसे उससे पहले सब कुछ बस घट रहा था, और उसके बाद पहली बार जीया जाने लगा।

मुझे याद है, उन दिनों रातें इतनी भारी नहीं होती थीं। नींद आने से पहले एक हल्की-सी प्रतीक्षा होती थी—कि शायद अभी तुम्हारा कोई संदेश आएगा। और अगर आ जाता, तो पूरी रात का रंग बदल जाता। हम कितनी मामूली बातों पर देर तक बात करते थे—किसी फिल्म का एक दृश्य, किसी किताब की एक पंक्ति, या दिनभर की कोई छोटी-सी घटना जिसे दुनिया में शायद कोई और महत्वपूर्ण न माने।

पर प्रेम हमेशा बड़े क्षणों में नहीं बसता। वह उन दो लोगों के बीच पैदा होता है जो एक-दूसरे की साधारणताओं को भी ध्यान से सुनते हैं।

उन दिनों बारिश भी अलग लगती थी। उसमें उदासी कम थी, संगति ज़्यादा थी। ऐसा लगता था जैसे हर गिरती बूँद किसी दूर बैठे व्यक्ति तक पहुँचने का एक रास्ता हो। मैं खिड़की के पास बैठकर देर तक तुमसे बातें करता और बाहर का अँधेरा उतना अकेला नहीं लगता था।

तुम्हारी हँसी तब बहुत सहज थी। उसमें कोई थकान नहीं थी, कोई छुपाव नहीं। और शायद मेरी आवाज़ भी तब इतनी बुझी हुई नहीं थी। हम दोनों अपने-अपने जीवन की दरारों को शब्दों से भरने की कोशिश करते थे, बिना यह जाने कि कुछ दरारें भरने के लिए नहीं होतीं—वे सिर्फ़ रोशनी को भीतर आने देती हैं।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, वह समय वास्तव में समय नहीं था—वह एक ठहरा हुआ मौसम था, जहाँ घड़ियाँ धीरे चलती थीं और दिल तेज़। जहाँ प्रतीक्षा तक सुंदर लगती थी।

फिर धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं। लेकिन बदलने से पहले जो था, उसकी कोमलता आज भी बची हुई है। जैसे किसी पुराने घर की दीवार पर धूप का एक फीका निशान, जो वर्षों बाद भी बताता है कि कभी यहाँ एक खिड़की हुआ करती थी।

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या हम सच में लोगों को खो देते हैं? या बस उनके साथ जुड़े हुए अपने ही एक रूप से दूर हो जाते हैं? क्योंकि तुमसे बात करते हुए मैं जो था, वह व्यक्ति अब कहीं दिखाई नहीं देता। वह उन्हीं रातों में छूट गया है, जहाँ हम बिना किसी वजह जागते रहते थे।

और अब, जब कभी बहुत हल्की हवा चलती है और कमरे में पर्दे धीरे-धीरे हिलते हैं, मुझे लगता है वही पुराना मौसम थोड़ी देर के लिए लौट आया है। वही मौसम, जब तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी… और दुनिया इतनी चुप नहीं लगती थी।

मुकेश ,,,,,,,,

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