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Sunday, 17 May 2026

और फिर तुमसे बातचीत का सिलसिला कम होता गया।

 

और फिर तुमसे बातचीत का सिलसिला कम होता गया।

पहले शब्दों के बीच सिर्फ़ थोड़ी-सी चुप्पी आती थी—वैसी, जैसी बारिश रुकने के बाद छज्जे से टपकती आख़िरी बूँदों के बीच होती है। फिर एक दिन महसूस हुआ कि चुप्पियाँ अब शब्दों से लंबी हो गई हैं। तुम्हारे संदेश आने लगे, पर उनमें तुम्हारा होना कम होता गया। जैसे कोई घर धीरे-धीरे अपना उजाला खो देता है, जबकि सारे दरवाज़े अब भी खुले रहते हैं।

मैंने कई शामें उस छोटे-से नीले टिक को देखते हुए बिताईं, जो कभी आश्वासन लगता था और अब सिर्फ़ सूचना भर रह गया था। कितनी अजीब बात है—मनुष्य कभी-कभी पूरे प्रेम को कुछ छोटे संकेतों में समेट देता है। एक “हाँ”, एक “ठीक हूँ”, एक देर से आया उत्तर… और फिर उन्हीं के बीच अपने टूटने की आवाज़ सुनता रहता है।

तुम्हारे साथ ऐसा नहीं था कि कोई आख़िरी लड़ाई हुई हो, या कोई भारी वादा टूटा हो। हमारे बीच बस धीरे-धीरे मौसम बदल गया था। जैसे किसी पेड़ को पता भी नहीं चलता कि उसकी सबसे हरी पत्ती कब चुपचाप पीली पड़ गई।

कभी जो रातें तुम्हारी आवाज़ से भरी रहती थीं, वहाँ अब पंखे की घूमती हुई आवाज़ थी और बीच-बीच में सड़क से गुज़रती किसी दूर की गाड़ी की रोशनी। मैं कई बार फोन उठाकर तुम्हारा नाम देखता, फिर रख देता। कुछ रिश्ते समाप्त नहीं होते—वे बस अपनी ही प्रतिध्वनि में बदल जाते हैं।

और सच कहूँ, मुझे तुम्हारी अनुपस्थिति से ज़्यादा तुम्हारी आदत की कमी महसूस हुई। वह साधारण-सी बात कि दिन में कोई एक व्यक्ति ऐसा है, जिससे बिना किसी कारण बात की जा सकती है। प्रेम शायद असाधारण क्षणों से नहीं बनता—वह उन्हीं मामूली बातों से बनता है जिन्हें हम उस समय महत्व नहीं देते।

अब कभी-कभी तुम्हारी याद किसी दुख की तरह नहीं आती। वह एक पुराने कमरे की गंध की तरह आती है—हल्की, धूल भरी, और अजीब तरह से सुकून देने वाली। जैसे कोई बहुत पुराना स्वेटर, जिसे वर्षों बाद अलमारी से निकालो और उसमें बीता हुआ समय अब भी तहों में रखा मिले।

मैंने यह भी जाना कि लोग अचानक दूर नहीं होते। वे पहले अपनी बेचैनियाँ छुपाने लगते हैं, फिर अपने दिन, फिर अपने भीतर की थकान। और एक दिन तुम पाते हो कि बातचीत अब सिर्फ़ शब्दों का आदान-प्रदान है—जीवन का नहीं।

उसके बाद मैंने रात में देर तक जागना छोड़ दिया। अब मैं खिड़की के पास बैठकर सिर्फ़ बाहर देखता हूँ। सामने वाली इमारत की एक खिड़की देर रात तक जलती रहती है। मैं नहीं जानता वहाँ कौन रहता है, पर कभी-कभी लगता है हर शहर में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति ज़रूर होता है जो उसी समय जाग रहा होता है जब तुम अपने सबसे गहरे अकेलेपन में होते हो।

और फिर धीरे-धीरे यह स्वीकार भीतर उतरने लगता है कि हर रिश्ता हमेशा साथ चलने के लिए नहीं बना होता। कुछ लोग हमारे भीतर सिर्फ़ एक मौसम छोड़ने आते हैं। वे चले जाते हैं, पर उनके जाने के बाद हमारे भीतर का तापमान हमेशा के लिए बदल जाता है।

अब अगर तुम लौट भी आओ, तो शायद हम पहले की तरह बात न कर पाएँ। क्योंकि कुछ दूरियाँ रास्तों से नहीं, समय से बनती हैं। और समय किसी भी प्रेम का सबसे शांत, सबसे निर्मम सत्य है।

फिर भी, कुछ रातों में जब बहुत धीमी बारिश होती है, मुझे लगता है तुम कहीं पास हो। जैसे कोई अधूरा वाक्य अभी भी हवा में तैर रहा हो। मैं उसे पूरा नहीं करता। कुछ चीज़ों का अधूरा रह जाना ही उनका अंतिम सौंदर्य होता है।

और तब समझ में आता है—तुमसे बातचीत कम नहीं हुई थी, बस वह धीरे-धीरे स्मृति में बदल रही थी। वही स्मृति, जो अब किसी पुराने गीत की तरह मेरे भीतर बजती रहती है… बिना आवाज़ के, बिना अंत के।


मुकेश ,,,

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