ईशावास्योपनिषद् का पञ्चदश मंत्र : हिरण्यमय पात्र, सत्य-आवरण एवं शंकरभाष्य का अद्वैत विवेचन
मूल मंत्र (यथावत)
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥
मंत्र का हिंदी अनुवाद
हे पूषन् (सूर्यरूप परमात्मा)! सत्य का मुख (स्वरूप) स्वर्णमय पात्र से ढका हुआ है। कृपया उसे हटा दें, जिससे मैं सत्यधर्म का पालन करते हुए आपके वास्तविक स्वरूप का दर्शन कर सकूँ।
शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)
मानुषदैववित्तसाध्यं फलम् शास्त्रलक्षणम् प्रकृतिलयान्तम्। एतावती संसारगतिः। अतः परं पूर्वोक्तम् ‘आत्मैवाभूद्विजानतः’ इति सर्वात्मभावः एव सर्वैषणासंन्यासज्ञाननिष्ठाफलम्। एवं द्विप्रकारः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो वेदार्थः अत्र प्रकाशितः। तत्र प्रवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य विधिप्रतिषेधलक्षणस्य कृत्स्नस्य प्रकाशने ‘प्रवर्ग्यान्तं ब्राह्मणम्’ उपयुक्तम्। निवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य प्रकाशने तु ‘बृहदारण्यकम्’ उपयुक्तम्। तत्र निषेकादिनान्तं कर्म कुर्वन् जिजीविषेत् यः विद्यया सहा परब्रह्मविषयया, तत्र उक्तम् — “विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” इति।
तत्र केन मार्गेण अमृतत्वम् अश्नुते इति उच्यते —
“तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यः य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः” (बृ. उ. ५।५।२) इति।
एतदुभयं सत्यं ब्रह्म उपासीनः यथोक्तकर्मकृत् च यः सः अन्तकाले प्राप्ते सत्यात्मानम् आत्मनः प्राप्तिद्वारं याचते हिरण्मयेन पात्रेण।
हिरण्मयम् इव हिरण्मयम् ज्योतिर्मयम् इत्येतत्।
तेन पात्रेण इव अपिधानभूतेन सत्यस्य एव आदित्यस्थस्य ब्रह्मणः अपिहितं आच्छादितं मुखम्।
सर्वम् अपावृणु हे पूषन्! सत्यधर्माय, तव सत्योपासनारूपधर्मयुक्ताय मम दृष्टये तव सत्यात्मनः उपलब्धये ॥ १५ ॥
शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)
यहाँ बताया गया है कि मानव और दिव्य साधनों से प्राप्त होने वाला जो फल है, वह शास्त्रों में वर्णित है और वह प्रकृतिलय तक सीमित है। यह ही संसार की सीमा है।
इसके आगे, जैसा कि पहले कहा गया — “आत्मैवाभूद्विजानतः”, वह सर्वात्मभाव ही सर्वकामनाओं के त्याग और ज्ञाननिष्ठा का अंतिम फल है।
इस प्रकार वेद का अर्थ दो प्रकार का है —
1. प्रवृत्तिलक्षण (कर्ममार्ग)
2. निवृत्तिलक्षण (ज्ञानमार्ग)
प्रवृत्तिमार्ग के लिए ब्राह्मण-भाग उपयुक्त है, और निवृत्तिमार्ग के लिए बृहदारण्यक उपयुक्त है।
जो व्यक्ति निषेक आदि कर्म करता हुआ जीवन की इच्छा रखता है और परब्रह्म-विषयक विद्या से युक्त है, उसके लिए कहा गया है —
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह…”
अब प्रश्न है कि अमृतत्व किस मार्ग से प्राप्त होता है।
श्रुति कहती है कि वह सत्य ब्रह्म सूर्य में स्थित पुरुष है तथा वही आत्मा भीतर भी है।
इन दोनों रूपों में सत्य ब्रह्म की उपासना करने वाला व्यक्ति, जीवन के अन्त समय में, सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति के लिए “हिरण्यमय पात्र” के माध्यम से प्रार्थना करता है।
“हिरण्यमय” का अर्थ है — ज्योतिर्मय, प्रकाशस्वरूप।
वह पात्र जैसे आवरण है, उसी प्रकार वह स्वर्णमय आवरण सत्यस्वरूप सूर्यस्थित ब्रह्म के मुख को ढक देता है।
हे पूषन्! उस आवरण को हटा दो, जिससे सत्यधर्म का पालन करने वाले मुझे तुम्हारे सत्यस्वरूप का दर्शन प्राप्त हो सके।
शोधपूर्ण निबंध
“ईशावास्योपनिषद् के पञ्चदश मंत्र में सूर्योपासना, सत्यावरण और शंकराचार्य की ब्रह्मदृष्टि”
ईशावास्योपनिषद् का पञ्चदश मंत्र उपनिषद् दर्शन में एक अत्यन्त प्रतीकात्मक और रहस्यपूर्ण प्रार्थना है, जिसमें सूर्य को सत्यस्वरूप ब्रह्म के रूप में देखा गया है और उसके ज्ञान को आवृत करने वाले “हिरण्यमय पात्र” का प्रतीकात्मक निरूपण किया गया है।
आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में इसे केवल एक बाह्य सूर्योपासना नहीं मानते, बल्कि इसे ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर होने वाली अंतिम प्रार्थना के रूप में देखते हैं।
हिरण्यमय पात्र का प्रतीकात्मक अर्थ
“हिरण्यमय पात्र” केवल स्वर्ण का पात्र नहीं है, बल्कि —
· तेज (ज्योति)
· दिव्यता
· उपासना का आवरण
· सीमित बोध
का प्रतीक है।
यह आवरण सत्य को ढकने वाला नहीं, बल्कि उसे आंशिक रूप से प्रकट करने वाला माध्यम है।
सत्य और सूर्य का संबंध
शंकराचार्य के अनुसार —
· “सत्य” = ब्रह्म
· “सूर्य” = ब्रह्म का दृश्य प्रतीक
बृहदारण्यक उपनिषद् में भी यह कहा गया है कि ब्रह्म ही सूर्य और आत्मा दोनों रूपों में स्थित है।
“पूषन् अपावृणु” का दार्शनिक अर्थ
यह प्रार्थना केवल भौतिक सूर्य से आवरण हटाने की नहीं है, बल्कि —
· अज्ञान का आवरण हटाने
· उपासना की सीमाओं से आगे बढ़ने
· आत्मदर्शन की प्राप्ति
की प्रार्थना है।
प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग
शंकराचार्य वेद को दो भागों में विभाजित करते हैं —
मार्ग | अर्थ |
प्रवृत्ति | कर्म और उपासना |
निवृत्ति | ज्ञान और मोक्ष |
यह मंत्र दोनों मार्गों के मध्य से आत्मज्ञान की ओर संकेत करता है।
५. अद्वैत दृष्टि में अंतिम अर्थ
अद्वैत वेदान्त के अनुसार —
· सूर्य = प्रतीक
· आवरण = अज्ञान
· दर्शन = आत्मज्ञान
जब अज्ञान का आवरण हटता है, तब साधक को यह बोध होता है कि सूर्य, आत्मा और ब्रह्म — सभी एक ही सत्य हैं।
ईशावास्योपनिषद् का यह पञ्चदश मंत्र साधक की अंतिम प्रार्थना का प्रतीक है — जहाँ वह बाह्य उपासनाओं से आगे बढ़कर सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव की याचना करता है।
आदि शंकराचार्य की व्याख्या इस मंत्र को एक प्रतीकात्मक ब्रह्मज्ञान-प्रार्थना के रूप में स्थापित करती है, जहाँ “हिरण्यमय पात्र” अज्ञान का आवरण है और उसका हटना आत्मसाक्षात्कार का द्वार है।
इस प्रकार यह मंत्र उपनिषद् यात्रा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक मोड़ है, जो साधक को प्रतीक से परे सत्य की ओर ले जाता है।
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