ईशावास्योपनिषद् का चतुर्दश मंत्र : सम्भूति–विनाश उपासना, मृत्यु-तीरण एवं शंकरभाष्य का अद्वैत विवेचन
मूल मंत्र (यथावत)
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥
मंत्र का हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति सम्भूति (उत्पत्ति/कार्य ब्रह्म) और विनाश (नाश/धर्मधर्मी भेदयुक्त जगत) — दोनों को साथ-साथ जानता है, वह विनाश (नाश-भाव/कर्म-जगत) के द्वारा मृत्यु को पार करके, सम्भूति (हिरण्यगर्भ उपासना/कार्य ब्रह्म) द्वारा अमरत्व (देवतात्मभाव/अमृत अवस्था) को प्राप्त करता है।
शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)
स्थित एवम् अतः समुच्चयः सम्भूत्यसम्भूत्युपासनयोः युक्त एव एकपुरुषार्थत्वाच्चेत्याह —
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद् वेद उभयं सह।
विनाशो नाम विनाशधर्मो यस्य कार्यस्य स तेन धर्मिणा भेदेनोच्यते विनाश इति।
तेन तदुपासनेन ऐश्वर्यम् अधर्मकामादिदोषजातं च मृत्युं तीर्त्वा हिरण्यगर्भोपासनेन अणिमादिप्राप्तिः फलम्।
तेन अनैश्वर्यादिमृत्युं अतीत्य सम्भूत्याः अव्याकृतोपासनया अमृतं प्रकृतिलयलक्षणम् अश्नुते।
“सम्भूतिं च विनाशं च” इत्यत्र वर्णलोपेन निर्देशः द्रष्टव्यः।
प्रकृतिलयफलश्रुत्यनुरोधात् ॥ १४ ॥
शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)
अतः यह स्पष्ट होता है कि सम्भूति और असम्भूति (या विनाश और सम्भूति) की उपासनाओं का समुच्चय ही उचित है, क्योंकि दोनों का सम्बन्ध एक ही पुरुषार्थ से है।
“सम्भूतिं च विनाशं च” —
यहाँ “विनाश” से अभिप्राय उस धर्म से युक्त कार्य-जगत है, जिसमें नाश का गुण विद्यमान रहता है। इसलिए धर्मी के भेद से उसे “विनाश” कहा गया है।
उसकी उपासना से ऐश्वर्य तथा अधर्म, काम आदि दोषों से उत्पन्न मृत्यु का अतिक्रमण होता है। और हिरण्यगर्भ की उपासना से अणिमा आदि सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार अनैश्वर्य और मृत्यु का अतिक्रमण करके, अव्याकृत (सम्भूति/प्रकृति) की उपासना द्वारा अमृतत्व अर्थात् प्रकृतिलय रूप अवस्था प्राप्त होती है।
“सम्भूतिं च विनाशं च” — इस पद में वर्णलोप के कारण संक्षिप्त निर्देश है, यह समझना चाहिए।
यह सब प्रकृतिलय फल-श्रुति के अनुरूप है।
शोधपूर्ण निबंध
“ईशावास्योपनिषद् के चतुर्दश मंत्र में सम्भूति–विनाश उपासना का समन्वय एवं शंकराचार्य की क्रमिक मोक्ष-मीमांसा”
ईशावास्योपनिषद् का चतुर्दश मंत्र उपनिषद् दर्शन में एक अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है, जिसमें सम्भूति और विनाश की उपासना के माध्यम से क्रमिक रूप से मृत्यु का अतिक्रमण और अमृतत्व की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट करते हैं कि उपनिषद् यहाँ विरोध नहीं, बल्कि क्रमिक आध्यात्मिक विकास (gradation of spiritual realization) का संकेत देता है।
सम्भूति और विनाश का अर्थ
शंकराचार्य के अनुसार —
सम्भूति = कार्य ब्रह्म / हिरण्यगर्भ / सृष्टि का सूक्ष्म आधार
विनाश = धर्म-धर्मी भेदयुक्त कार्य जगत (नाशशील जगत)
यह दोनों ही ब्रह्म के सापेक्ष रूप हैं, न कि अंतिम सत्य।
मृत्यु का तात्त्विक अर्थ
यहाँ “मृत्यु” केवल शरीर का अंत नहीं है, बल्कि
अनैश्वर्य
सीमितता
अज्ञानजन्य बन्धन
का प्रतीक है।
“विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा” का अर्थ
शंकराचार्य के अनुसार
कर्म-जगत (विनाश) की उपासना से साधक स्थूल बन्धनों से ऊपर उठता है और सीमितता का अतिक्रमण करता है।
“सम्भूत्यामृतम् अश्नुते” का अर्थ
इसके पश्चात् हिरण्यगर्भ या उच्चतर उपासना के माध्यम से साधक —
ऐश्वर्य
सूक्ष्म शक्ति
उच्च चेतना
की अवस्था प्राप्त करता है, जिसे यहाँ “अमृतत्व” कहा गया है।
समुच्चय सिद्धान्त
शंकराचार्य यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त स्थापित करते हैं
उपासना मार्गों का विरोध नहीं, बल्कि उनका क्रमिक समुच्चय ही उचित है।
पहला चरण → विनाश/कर्म उपासना
दूसरा चरण → सम्भूति/उच्च उपासना
परिणाम → अमृत अवस्था
अद्वैत वेदान्त में स्थान
अद्वैत के अनुसार — यह सब “व्यवहारिक सत्य” के स्तर पर है
अंतिम सत्य = निरुपाधिक ब्रह्म
इसलिए यह मंत्र साधक को क्रमशः उच्च स्तरों से गुजरते हुए अंततः आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
ईशावास्योपनिषद् का यह चतुर्दश मंत्र आध्यात्मिक साधना की एक क्रमिक संरचना प्रस्तुत करता है, जिसमें कर्म-जगत और उच्च उपासना दोनों को साधन रूप में स्वीकार किया गया है।
आदि शंकराचार्य की व्याख्या यह स्पष्ट करती है कि उपनिषद् का उद्देश्य विभिन्न साधनाओं का समन्वय कर साधक को धीरे-धीरे अमृतत्व और आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर करना है।
इस प्रकार यह मंत्र भारतीय दार्शनिक परम्परा में साधना के क्रमिक विकास और अद्वैत की ओर उन्मुख यात्रा का एक महत्वपूर्ण सोपान है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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