कुछ दरवाज़े बंद होकर भी खुले रहते हैं
कुछ दरवाज़े बंद होकर भी खुले रहते हैं,
उन पर दस्तक नहीं होती —
मगर यादें आती-जाती रहती हैं।
वक़्त धूल तो जमा देता है रिश्तों पर,
पर कुछ आवाज़ें
अब भी भीतर तक सुनाई देती हैं।
कोई एक लम्हा,
किसी की मुस्कुराहट,
या अधूरी-सी आख़िरी बात—
रूह में ऐसे ठहर जाती है
जैसे शाम मस्जिद की सीढ़ियों पर ठहरी हो।
हम आगे बढ़ भी जाएँ तो क्या,
कुछ लोग दिल के उस कमरे में उम्र भर रहते हैं
जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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