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Saturday, 23 May 2026

वह लड़की जिसके दाँत चूहे जैसे सफ़ेद थे

वह लड़की जिसके दाँत चूहे जैसे सफ़ेद थे

अब जब उन दिनों की तरफ़ लौटकर देखता हूँ, तो सबसे अधिक अजीब यह लगता है कि बचपन में हम मनुष्यों को उनके गुणों से नहीं, उनकी छोटी-छोटी विचित्रताओं से पहचानते थे।

किसी के कान बड़े होते थे।

कोई चलते समय एक पैर घसीटता था।

कोई हमेशा नाक पोंछता रहता था।

और वह लड़की — जिसके बारे में मैं इतने वर्षों बाद भी सोचता हूँ — अपने अस्वाभाविक रूप से सफ़ेद दाँतों के कारण याद रह गई।

वे सचमुच चूहे जैसे सफ़ेद थे।

छोटे।

एकदम चमकीले।

जब वह हँसती थी तो लगता था जैसे उसके साँवले नहीं, बल्कि बहुत पतली, लगभग पारदर्शी गोरी त्वचा वाले चेहरे पर अचानक कोई सफ़ेद चमक कौंध गई हो।

हम प्राथमिक विद्यालय में साथ पढ़ते थे।

वही पुराना सरकारी स्कूल।

दीवारों पर उखड़ा हुआ चूना।

बरामदों में धूल।

लोहे की घंटी।

और गर्मियों में पसीने और स्लेट की मिली-जुली गंध।

वह हमेशा दूसरी या तीसरी बेंच पर बैठती थी।

लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में कम और इधर-उधर की चीज़ों में अधिक रहता था।

उसकी आँखों में एक अजीब-सी घुन्नी चमक थी।

जैसे वह हर समय कोई छोटा-सा रहस्य अपने भीतर छिपाए रहती हो।

धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि वह झूठ बहुत बोलती थी।

इतनी सहजता से कि कई बार शिक्षक भी सच मान लेते।

अगर किसी की पेंसिल गायब हो जाए, रबर खो जाए, या टिफ़िन से अमरूद का टुकड़ा कम निकल आए, तो संदेह अक्सर उसी पर जाता।

लेकिन वह तुरंत मासूम चेहरा बना लेती।

अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर कहती—

“मैंने नहीं लिया।”

और सच कहूँ तो उस समय उसका चेहरा इतना भोला लगने लगता कि मुझे स्वयं अपने संदेह पर शर्म आने लगती।

एक बार मेरी नई नीली पेंसिल गायब हो गई थी।

वही जिसमें ऊपर लाल रबर लगी थी।

मैंने पूरी कक्षा में ढूँढा।

फिर अगले दिन वही पेंसिल उसके पास दिखी।

मैं पहचान गया था।

लेकिन उसने बड़ी सहजता से कहा

“ये मेरी है। मामा लाए थे।”

मैं चुप हो गया।

क्योंकि मैं हमेशा से दब्बू था।

उन लड़कों में से जो शिकायत नहीं कर पाते।

जो अपनी चीज़ें खो जाने पर भी धीरे-धीरे मान लेते हैं कि शायद गलती उन्हीं की रही होगी।

लेकिन उसी लड़की की एक दूसरी आदत भी थी।

वह अपनी खाने की चीज़ें हमेशा बाँटती थी।

उसके टिफ़िन में अक्सर गुड़ लगी रोटी, आम का अचार, या बेसन के छोटे लड्डू होते।

वह बिना पूछे आधा मेरी तरफ़ बढ़ा देती।

कई बार तो ऐसा लगता था जैसे चोरी करना और बाँटना — दोनों उसके स्वभाव में साथ-साथ रहते हों।

जैसे उसके भीतर दो अलग बच्चे रहते थे।

एक छोटा चोर।

और एक बहुत उदार लड़की।

मुझे आज भी एक दोपहर साफ़ याद है।

मध्यांतर के समय कुछ बड़े लड़कों ने मेरा मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया था।

शायद मेरी पतली आवाज़ को लेकर।

या इस बात पर कि मैं खेलता कम था।

मैं चुप खड़ा रहा।

हमेशा की तरह।

लेकिन वह अचानक वहाँ आ गई।

उस दिन उसके बाल दो ढीली चोटियों में बँधे थे।

उसने उन लड़कों से कहा

“काहे परेशान करते हो उसे?”

वे हँसने लगे।

तब वह सचमुच लड़ने को तैयार हो गई थी।

उसकी बहुत पतली गोरी गर्दन गुस्से में लाल पड़ गई थी।

मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि इतनी झूठ बोलने वाली लड़की किसी दूसरे के लिए इतनी सच्चाई से कैसे लड़ सकती थी।

शायद मनुष्य कभी एक चीज़ नहीं होता।

बचपन में तो बिल्कुल नहीं।

उसके बारे में स्कूल में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।

कोई उसे “चोट्टी” कहता।

कोई “झूठी”।

एक अध्यापक ने एक बार पूरी कक्षा के सामने कहा था

“इस लड़की की आदतें ठीक नहीं हैं।”

वह सिर झुकाकर खड़ी रही।

लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने देखा, वह खिड़की के बाहर देख रही थी और बहुत धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।

जैसे उसे किसी की बात से वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता।

फिर एक साल के बाद वह अचानक स्कूल आना बंद हो गई।

न किसी ने ठीक से बताया कि कहाँ गई।

न मैंने पूछने की हिम्मत की।

उस उम्र में लोग अचानक गायब हो जाते थे।

और हम इसे जीवन का सामान्य हिस्सा मान लेते थे।

धीरे-धीरे उसका नाम भी स्मृति से मिट गया।

आज सचमुच याद नहीं कि उसे क्या कहते थे।

लेकिन कुछ चीज़ें अब भी बची हुई हैं।

उसके सफ़ेद दाँत।

उसकी पतली त्वचा के नीचे दिखती नीली नसें।

झूठ बोलते समय उसकी आँखों की मासूमियत।

और वह अजीब न्याय-बोध जिसके कारण वह दूसरों के लिए लड़ पड़ती थी।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है, दुनिया ने शायद उसे “छोटी चोर” या “झूठी लड़की” की तरह याद किया होगा।

लेकिन मेरी स्मृति में वह वैसी नहीं है।

मुझे तो वह हमेशा दिल की सच्ची लगी।

क्योंकि बचपन में मनुष्य अपने दोषों को छिपाना नहीं जानता।

जो जैसा होता है, लगभग वैसा ही दिखाई देता है।

और शायद इसी कारण बचपन की स्मृतियाँ इतनी तकलीफ़देह और इतनी सुंदर होती हैं।

वे हमें यह याद दिलाती रहती हैं कि मनुष्य अच्छाई और बुराई में नहीं बना होता।

बल्कि उन दोनों के बीच की किसी धुँधली, काँपती हुई जगह में बना होता है — जहाँ एक लड़की किसी की पेंसिल चुरा सकती है, और उसी दोपहर उसके लिए पूरी दुनिया से लड़ भी सकती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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