ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित
दिन धीरे-धीरे समाप्त नहीं होता
वह भीतर कहीं गिरता है
जैसे पानी किसी अंधे कुएँ में गिरता रहता है
और उसकी आवाज़
बहुत देर बाद सुनाई देती है
मैंने एक चेहरा याद करना चाहा
पर स्मृति ने केवल उसकी अनुपस्थिति लौटाई
मानो भूल जाना ही
याद रखने का सबसे गहरा रूप हो
प्रेम शायद वही क्षण है
जब दो लोग
एक-दूसरे को समझने से पहले
अचानक चुप हो जाते हैं
सड़कें कहीं नहीं जातीं
वे केवल मनुष्य के भीतर घूमती रहती हैं
और हर मोड़ पर
एक पुराना भय बैठा मिलता है
मैंने रात से पूछा—
“क्या समय सचमुच बीत जाता है?”
रात हँसी
और मेरे बालों में थोड़ी सफेदी छोड़ गई
एक खिड़की खुली थी
पर बाहर कोई दृश्य नहीं था
सिर्फ हवा थी
जो किसी अनकहे वाक्य की तरह
बार-बार लौट रही थी
यह शरीर भी अजीब है
धीरे-धीरे स्मृतियों का घर बन जाता है
और एक दिन
स्वयं ही अपने भीतर अजनबी हो जाता है
अंत में
हम सब शायद वही बन जाते हैं
जिससे जीवन भर बचना चाहते थे
एक शांत
लगभग अदृश्य
अकेलापन
मुकेश ,,,,,,,,,,
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