सामने वाले मकान की खिड़की
अब जबकि उन दिनों को बीते इतना समय हो चुका है कि उस शहर की सड़कों के नाम भी मेरी स्मृति में धीरे-धीरे घुलने लगे हैं, मुझे कई बार यह लगता है कि बचपन वास्तव में घटनाओं से नहीं बना होता; वह कुछ दृश्यों से बना होता है जो बिना किसी स्पष्ट कारण के भीतर अटक जाते हैं और फिर वर्षों तक हमारे भीतर वैसे ही मौजूद रहते हैं, जैसे पुराने घरों में बंद कमरों की हल्की-सी सीलन, जिसे कोई देख नहीं सकता लेकिन जो हर चीज़ में धीरे-धीरे उतरती रहती है।
हमारे घर के सामने एक छोटा-सा किराये का मकान था।
वहाँ लोग आते-जाते रहते थे। छोटे शहरों में किराये के मकानों का जीवन अस्थायी होता है। दरवाज़ों पर नाम बदलते रहते हैं, पर खिड़कियाँ वही रहती हैं।
एक गर्मियों की दोपहर वे लोग वहाँ रहने आए।
एक ट्रक आया। कुछ लोहे के बक्से। एक सिलाई मशीन। बाँस की कुर्सियाँ। और उनके बीच वह औरत, जो पहली बार मुझे तब दिखाई दी जब वह सिर पर आँचल टिकाए बरामदे में खड़ी किसी मज़दूर को बता रही थी कि अलमारी कहाँ रखनी है।
उस समय मैं चौदह वर्ष का था।
उस उम्र में आदमी अभी दुनिया को समझता नहीं, केवल उसे देखने लगता है।
वह मुझसे बहुत बड़ी थी। यह बात मैं तुरंत समझ गया था। कितनी बड़ी — यह नहीं। बाद में अनुमान लगाया कि शायद पंद्रह वर्ष। शायद अधिक।
लेकिन उम्र कई बार चेहरों से नहीं, थकान से समझ में आती है।
उसके चेहरे पर वही थकान थी।
वह सुंदर थी या नहीं — यह मैं उस समय तय नहीं कर पाता। क्योंकि किशोरावस्था में आकर्षण और सुंदरता अलग-अलग नहीं होते। जो हमें भीतर से विचलित कर दे, वही सुंदर लगने लगता है।
मुझे उसकी चाल याद है।
धीमी नहीं, लेकिन जैसे वह हमेशा किसी अदृश्य बोझ के साथ चलती हो।
और उसकी खिड़की।
उनके मकान की सामने वाली खिड़की ठीक हमारे बरामदे के सामने पड़ती थी। दोपहर में वह खिड़की खुली रहती। भीतर टेबल फैन घूमता दिखाई देता। सफ़ेद परदे हिलते रहते। और कई बार वह वहाँ बैठी दिखाई देती — कभी कपड़े तह करते हुए, कभी बाल सुखाते हुए, कभी बिना कुछ किए केवल बाहर देखते हुए।
अब सोचता हूँ, शायद उसी समय मैंने पहली बार किसी स्त्री के अकेलेपन को देखा था, हालाँकि उस समय मैं उसे केवल “चुप रहना” समझता था।
उसका पति सुबह जल्दी चला जाता। शाम को लौटता। उसका चेहरा मुझे याद नहीं। केवल उसकी अनुपस्थिति याद है।
गर्मियों की दोपहरें बहुत लंबी होती थीं उन दिनों। बिजली चली जाती। पूरा मोहल्ला सुस्त पड़ जाता। मैं किताब लेकर बरामदे में बैठ जाता, हालाँकि पढ़ता बहुत कम था।
कई बार मुझे लगता वह जानती है कि मैं उसे देखता हूँ।
लेकिन उसने कभी इस बात को असहज नहीं होने दिया।
एक दिन उसने अचानक पूछा
“इतनी देर तक पढ़ लेते हो?”
मैं चौंक गया।
किताब तुरंत बंद कर दी।
“हाँ… मतलब…”
मैं आगे कुछ नहीं कह पाया।
वह कुछ क्षण मुझे देखती रही। फिर बहुत हल्के से मुस्कराई। उस मुस्कान में मज़ाक नहीं था। बल्कि एक ऐसी कोमलता थी जो बड़े लोग बच्चों को देखते समय महसूस करते हैं।
“अभी पढ़ लो,” उसने कहा, “बाद में समय बहुत जल्दी भागता है।”
उस समय यह वाक्य मुझे सामान्य लगा था। अब लगता है कि बड़े लोग अपने जीवन का सारा दुःख इसी तरह साधारण वाक्यों में छिपाकर बोलते हैं।
उसके बाद कभी-कभी छोटी-छोटी बातें होने लगीं।
“कॉलेज कहाँ जाओगे?”
“तुम बहुत चुप रहते हो।”
“तुम्हारी माँ की आवाज़ बहुत अच्छी है।”
लेकिन मुझे हमारी बातें नहीं याद। मुझे उन बातों के बीच की चुप्पियाँ याद हैं।
शाम को वह खिड़की के पास खड़ी रहती और सड़क देखती। बिना किसी विशेष रुचि के। जैसे बाहर कुछ खोज नहीं रही, केवल भीतर से बचने के लिए बाहर देख रही हो।
एक बार बारिश हुई। तेज़ हवा। कपड़े उड़ने लगे। उसकी एक साड़ी नीचे आ गिरी। मैं दौड़कर उठा लाया।
जब मैंने साड़ी उसकी ओर बढ़ाई, हमारी उँगलियाँ क्षणभर छुईं।
आज सोचता हूँ — मनुष्य के भावनात्मक जीवन में कुछ क्षण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें उस समय पहचानना संभव नहीं होता, लेकिन बाद में वही पूरे वर्षों पर छाया की तरह फैल जाते हैं।
उसने कहा— “धन्यवाद।”
बस इतना।
लेकिन उस रात मैं बहुत देर तक जागता रहा। बाहर बारिश होती रही। और पहली बार मुझे लगा कि मेरे भीतर कुछ ऐसा शुरू हो चुका है जिसका नाम मुझे नहीं मालूम।
कुछ सप्ताह बाद मैंने महसूस किया कि वह पहले से अधिक चुप रहने लगी है। कई बार खिड़की खुली रहती लेकिन वह दिखाई नहीं देती। कभी दिखाई देती तो थकी हुई। एक बार उसकी आँखें लाल थीं, जैसे रोई हो या सोई न हो।
मैंने कुछ पूछने की कभी हिम्मत नहीं की।
बचपन कई बार संवेदनशील होता है, पर साहसी नहीं।
फिर अचानक एक दिन ट्रक आया।
सामान वापस चढ़ाया जाने लगा।
मैं बरामदे में खड़ा रहा। बहुत देर तक। बिना किसी स्पष्ट अधिकार के दुखी।
वह आख़िरी बार खिड़की बंद करने आई।
हमारी आँखें मिलीं।
उसने वही हल्की मुस्कान दी।
और कहा—
“अच्छे से पढ़ना।”
बस इतना।
फिर खिड़की बंद हो गई।
आज इतने वर्षों बाद भी, जब किसी पुराने मोहल्ले में किराये के मकानों की कतार दिखाई देती है, या जब गर्मियों की दोपहर में कोई खिड़की आधी खुली रह जाती है और भीतर पंखे की आवाज़ आती रहती है, तब मुझे अचानक वह औरत याद आ जाती है।
और तब मैं सोचता हूँ — शायद मनुष्य के भीतर प्रेम की पहली हलचल किसी महान सौंदर्य से नहीं, बल्कि किसी दूसरे मनुष्य के साधारण अकेलेपन को पहली बार महसूस करने से जन्म लेती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment