ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित
रात किसी दर्शन की तरह नहीं उतरती
वह एक दरार है
जिसमें से समय रिसता रहता है
मैंने दरवाज़ा खोला
तो बाहर कुछ भी नहीं था
सिर्फ भीतर का थोड़ा-सा हिस्सा
जो बाहर खड़ा था
प्रेम कोई मुलाक़ात नहीं
वह दो अनुपस्थितियों के बीच
टिकी हुई एक अस्थिर रोशनी है
शहरों में लोग नहीं रहते
वहाँ केवल उनके छोड़े हुए अर्थ रहते हैं
जो हर सुबह
थोड़ा और बदल जाते हैं
मैंने अपने हाथों को देखा
तो वे किसी और के विचार लग रहे थे
और मेरे विचार
किसी अजनबी की नींद में चल रहे थे
एक स्त्री गुज़री
तो हवा थोड़ी देर के लिए अर्थवान हो गई
फिर तुरंत फिर से खाली हो गई
यह जीवन कोई कहानी नहीं
यह तो एक अधूरी वाक्य-रचना है
जिसमें क्रिया हर बार बदल जाती है
पर अर्थ कभी पूरा नहीं होता
और मैं
अपने ही भीतर बिखरा हुआ
एक ऐसा मौन हूँ
जो खुद को सुनने की कोशिश में
और अधिक खो जाता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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