ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित
रात किसी टूटे हुए वाद्य-यंत्र की तरह बजती है
जिसमें स्वर नहीं बचते, सिर्फ कंपन रह जाते हैं
और हवा
उन कंपन को याद करती हुई
धीरे-धीरे थक जाती है
मैंने अपने भीतर झाँका
तो वहाँ कोई स्थिर चेहरा नहीं था
बस बदलते हुए प्रतिबिंब थे
जो एक-दूसरे को पहचानने से इंकार करते थे
प्रेम एक घटना नहीं
एक धीमी प्रक्रिया है
जैसे पानी का पत्थर बनना
और पत्थर का फिर पानी हो जाना
कभी-कभी लगता है
हम लोग स्मृतियों के शहर में रहते हैं
जहाँ घर असल में घर नहीं
बल्कि अधूरी कहानियों के ठिकाने हैं
मैंने एक स्पर्श को याद करने की कोशिश की
तो मेरी उँगलियों ने जवाब दिया
“हम किसी और समय में छूट गए थे”
यह जीवन कोई यात्रा नहीं
यह तो रुक-रुक कर चलने वाली एक अनिश्चित साँस है
जो हर बार शुरू होने से पहले
थोड़ा और पुरानी हो जाती है
और मैं
अपने ही भीतर के गलियारों में खोया हुआ
एक ऐसा मौन हूँ
जिसे शब्दों ने अभी छूना सीखना बाकी है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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