हम किसी ऐसी दिशा में चलेंगे
जहाँ दिशाएँ खुद रास्ता भूल जाती हैं।
तुम अपनी हथेली में
एक अनसुना मौसम दबाकर रखोगी
जो सिर्फ़ तभी खुलता है
जब कोई उसे देखने की कोशिश न करे।
मैं एक ऐसे पेड़ के नीचे खड़ा होऊँगा
जिसकी छाया उल्टी दिशा में गिरती है,
और हर पत्ता गिरने से पहले
अपना नाम बदल लेता है।
वहाँ एक नदी होगी
जो पानी नहीं,
लोगों की अधूरी बातें बहाती है।
तुम एक पत्थर फेंकोगी
जो हवा में ही थककर
अपनी उम्र बदल लेगा।
मैं एक दरवाज़ा बनाऊँगा
जो खुलने के बजाय
अपने भीतर ही सिकुड़ जाता है।
हम दोनों मुस्कुराएँगे,
लेकिन मुस्कान
हमारे चेहरे पर नहीं
किसी और समय के कंधों पर टिकेगी।
और फिर हम समझेंगे,
यहाँ कुछ भी खत्म नहीं होता,
बस चीज़ें
अपनी परछाइयों से आगे निकल जाती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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