हम उतरेंगे
उस जगह की सीढ़ियों से
जहाँ नीचे जाना भी ऊपर जाने जैसा लगता है।
तुम अपने बालों में
रात की एक पतली-सी चाबी छिपाओगी,
और मैं उसे छूते ही
एक अनजाना दरवाज़ा खोल बैठूँगा।
वहाँ कोई दीवार नहीं होगी,
सिर्फ़ आवाज़ों की परछाइयाँ
जो बिना बोले ही बहस करती हैं।
मैं एक टूटे हुए शब्द को
जोड़ने की कोशिश करूँगा,
लेकिन हर बार वह
किसी नए अर्थ में बदल जाएगा।
तुम हवा में
अपनी उँगली से एक गोला बनाओगी,
और वह गोला
अंदर की तरफ़ गिरने लगेगा।
हम चुप रहेंगे,
और चुप्पी भी
हमसे पूछेगी
तुम लोग यहाँ क्यों हो?
फिर हम समझेंगे,
यह जगह खोजने के लिए नहीं थी,
यह तो खुद हमें
खो देने के लिए बनी थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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