हम चलेंगे
उस बंद कमरे की तरफ़
जहाँ खिड़कियाँ नहीं खुलतीं,
सिर्फ़ धूल अपने ही नियमों से गिरती है।
हम बैठेंगे वहाँ
जहाँ समय की घड़ी ने टिक-टिक करना छोड़ दिया है।
तुम मेरे हाथ पर
अपनी उँगलियों की टूटी हुई गर्माहट रखोगी।
मैं दीवार पर एक दरार बनाऊँगा
और उसमें से आकाश देखने की कोशिश करूँगा।
तुम एक पुरानी याद को
कुएँ में गिरा दोगी —
पानी फिर भी नहीं हिलेगा।
हम हँसेंगे,
लेकिन आवाज़ बाहर नहीं जाएगी।
सिर्फ़ लौटकर हमारे ही भीतर गिरेगी।
फिर हम इंतज़ार करेंगे,
उस चीज़ का नाम भूलकर,
जिसका कभी आना तय था।
मुकेश ,,,,,,,,,
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