वह शाम किसी साधारण शाम जैसी नहीं थी, लेकिन यह बात बाद में समझ में आती है—जब कोई घटना बीत चुकी होती है और स्मृति उसे अपने अनुसार सजाने लगती है।
शहर
की सड़क पर हल्की
नमी थी। हाल ही
में बारिश हुई थी या
होने वाली थी—यह
फर्क भी उस समय
महत्व नहीं रखता था।
हवा में एक अधूरापन
था, जैसे कोई वाक्य
बीच में रुक गया
हो और शब्द रास्ता
भूल गए हों।
वह आदमी अक्सर ऐसे
ही समय में बाहर
निकलता था—जब रोशनी
और अंधेरे के बीच एक
अनिश्चित समझौता चल रहा होता
था। उसे लगता था
कि ऐसे क्षणों में
लोग अपने असली रूप
में होते हैं, क्योंकि
तब वे किसी भूमिका
को निभाने की कोशिश नहीं
कर रहे होते।
उसी
दिन वह पहली बार
उसे फिर से मिला।
वह महिला।
उसका
चेहरा देखकर कोई तुरंत कुछ
नहीं कह सकता था।
उसमें सुंदरता थी, लेकिन वह
स्थिर नहीं थी। जैसे
कोई चित्र हर देखने पर
थोड़ा बदल जाता हो।
उसकी आँखों में एक ऐसी
आदत थी जो बहुत
धीरे-धीरे विकसित होती
है—लोगों को देखना और
फिर देर तक उन्हें
भूल न पाना, लेकिन
उसी भूलने की प्रक्रिया में
उन्हें छोड़ देना।
दोनों
की मुलाकात एक बस स्टॉप
पर हुई।
बस देर से आ
रही थी। यह तथ्य
दोनों के लिए सामान्य
था, लेकिन उस समय यह
असामान्य रूप से महत्वपूर्ण
लग रहा था, क्योंकि
प्रतीक्षा ने दोनों को
एक ही समय के
भीतर बंद कर दिया
था।
उसने
हल्के स्वर में कहा—
“आज बसें भी जैसे
तय नहीं कर पा
रहीं कि जाना कहाँ
है।”
वह मुस्कुराई नहीं। लेकिन उसकी आँखों में
एक क्षणिक स्वीकार था, जैसे उसने
यह बात पहले भी
किसी और के मुँह
से सुनी हो, या
शायद किसी और जीवन
में।
यहीं
से शुरुआत हुई।
या शायद यहीं कुछ
समाप्त हो गया।
अगले
कुछ दिनों में वे मिलने
लगे।
मिलना
कोई योजना नहीं थी। यह
बस होता गया। जैसे
दो धागे हवा में
उड़ते-उड़ते एक-दूसरे से
उलझ जाएँ और फिर
यह तय न कर
पाएं कि उन्हें अलग
होना चाहिए या साथ रहना
चाहिए।
वह आदमी धीरे-धीरे
उसके बारे में नोट
करने लगा।
वह जल्दी जुड़ती थी।
बहुत
जल्दी।
इतनी
जल्दी कि संबंध बनने
से पहले ही उसमें
एक तरह की पूर्णता
आ जाती थी। जैसे
किसी कहानी का अंत पहले
लिख दिया गया हो
और बीच के पन्ने
बाद में भरे जा
रहे हों।
फिर
वह धीरे-धीरे पीछे
हटने लगती।
यह पीछे हटना आक्रामक
नहीं था।
न कोई शिकायत, न
कोई स्पष्टीकरण।
बस उपस्थिति का हल्का-सा
क्षरण।
जैसे
दीवार पर पड़ा हुआ
साया शाम ढलने के
साथ-साथ पतला होता
जाता है, और अंत
में यह भी तय
नहीं रहता कि वह
था भी या नहीं।
एक दिन वे नदी
के किनारे बैठे थे।
पानी
स्थिर नहीं था, लेकिन
उसकी गति भी स्पष्ट
नहीं थी। उसमें एक
तरह की अनिश्चितता थी,
जैसे समय स्वयं पानी
के रूप में बह
रहा हो।
वह कुछ देर चुप
रही।
फिर
उसने कहा—
“मुझे लगता है, मैं
किसी के साथ ज्यादा
देर तक नहीं रह
पाती।”
वह आदमी कुछ नहीं
बोला।
क्योंकि
ऐसे वाक्यों का उत्तर नहीं
होता। केवल उनके साथ
बैठा जा सकता है।
उसने
पूछा—
“क्यों?”
उसने
नदी की तरफ देखा।
पानी में कुछ पत्ते
बह रहे थे—धीरे,
बिना संघर्ष के।
उसने
कहा—
“शुरू में लगता है
कि मैं वहाँ हूँ…
फिर एक दिन लगता
है कि मैं वहाँ
नहीं हूँ।”
यह वाक्य सरल था। लेकिन
उसमें एक अजीब तरह
की अंतिमता थी।
जैसे
कोई व्यक्ति यह नहीं बता
रहा कि वह जा
रहा है, बल्कि यह
बता रहा है कि
वह पहले ही जा
चुका है।
आदमी
ने धीरे-धीरे समझना
शुरू किया कि उसके
भीतर एक विशेष प्रकार
की दूरी है।
यह दूरी दूसरों से
नहीं थी।
यह अपने ही अनुभव
से थी।
वह किसी भावना को
पूरी तरह जीती नहीं
थी, वह उसे देखती
थी। जैसे कोई खिड़की
से बाहर बारिश देखता
है—भीगता नहीं, बस जानता है
कि बारिश हो रही है।
और शायद इसी कारण
उसके संबंधों में कोई संघर्ष
नहीं था।
संघर्ष
वहाँ होता है जहाँ
दो लोग एक ही
चीज़ को अलग-अलग
तरीके से पकड़ने की
कोशिश करते हैं।
लेकिन
वह पकड़ती ही नहीं थी।
कुछ
हफ्तों बाद, वह अचानक
कम मिलने लगी।
कोई
कारण नहीं था।
कम से कम बाहरी
कारण नहीं।
न कोई झगड़ा, न
कोई गलतफहमी।
बस संदेशों के बीच का
अंतराल बढ़ गया।
फिर
वह अंतराल मौन में बदल
गया।
और मौन धीरे-धीरे
आदत में।
एक दिन आदमी उसी
बस स्टॉप पर खड़ा था
जहाँ वे पहली बार
मिले थे।
बसें
आ रही थीं, जा
रही थीं।
लोग
चढ़ रहे थे, उतर
रहे थे।
सब कुछ सामान्य था।
लेकिन
उसे लगा कि वह
जगह अब थोड़ी खाली
है—ऐसी खाली जो
दिखाई नहीं देती, केवल
महसूस होती है।
जैसे
किसी दृश्य से कोई पात्र
नहीं गया हो, बल्कि
उसकी संभावना ही मिट गई
हो।
कुछ
महीनों बाद उसने उसे
सड़क पर देखा।
वह किसी और के
साथ चल रही थी।
उसी
तरह धीरे, उसी तरह बिना
किसी घोषणा के।
उसने
उसे देखा भी नहीं।
या शायद देखा और
पहचानने का निर्णय नहीं
लिया।
आदमी
वहीं खड़ा रह गया।
उसे
किसी दर्द का अनुभव
नहीं हुआ।
केवल
एक हल्की-सी समझ बनी—कि कुछ लोग
जीवन में आते हैं,
संबंध बनाने के लिए नहीं,
बल्कि संबंधों की सीमाएँ दिखाने
के लिए।
उस रात वह देर
तक सोचता रहा।
उसे
लगा कि शायद वह
महिला किसी विकार से
ग्रस्त नहीं थी।
न कोई स्पष्ट असामान्यता।
बल्कि
एक ऐसी संरचना थी,
जिसमें जुड़ाव एक क्षणिक घटना
थी और दूरी उसकी
प्राकृतिक अवस्था।
जैसे
कुछ लोग आग की
तरह होते हैं—जलते
हैं, गर्मी देते हैं, लेकिन
किसी को अपने भीतर
टिकने नहीं देते।
और अंत में उसे
यह भी समझ आया
कि शायद वह महिला
किसी को छोड़ती नहीं
थी।
वह बस उस बिंदु
तक पहुँच जाती थी जहाँ
उसका “होना” अपने आप हल्का
होकर हवा में मिल
जाता था।
जैसे
पानी में लिखी हुई
कोई रेखा,
जो न मिटती है,
न रहती है
बस दिखाई देना बंद कर
देती है।
मुकेश ,,,,,,,
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