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Tuesday, 26 May 2026

वह बस वहाँ से धीरे-धीरे अदृश्य हो जाती थी,

 

 वह बस वहाँ से धीरे-धीरे अदृश्य हो जाती थी,

मैंने उसे पहली बार उसी तरह देखा था जैसे लोग किसी खिड़की के पार चलते हुए धुंधले प्रतिबिंब को देखते हैंउसे देखने के बाद भी यह तय नहीं कर पाते कि उन्होंने सच में कुछ देखा भी था या नहीं।

उसके चेहरे में एक अजीब-सी स्थिरता थी। पूर्ण मुस्कान, पूर्ण उदासी। जैसे कोई भाव अपने जन्म से पहले ही रुक गया हो और आगे बढ़ना भूल गया हो। और फिर भी उसमें एक तरह की कोमलता थीजो तुरंत अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती, बल्कि देर से समझ में आती है, जैसे किसी कमरे में बिछी हुई हल्की धूप।

मैंने उसके बारे में जो पहली बात नोट की, वह उसका चेहरा नहीं था। वह था उसकारुकना

वह लोगों के बीच आती थी, जैसे कोई यात्री किसी स्टेशन पर उतरता है बहुत शोर के साथ, बहुत तैयारी के साथ। लेकिन अजीब बात यह थी कि वह हमेशा थोड़े समय में किसी के बहुत करीब हो जाती थी। इतनी जल्दी कि सामने वाला व्यक्ति यह मान लेता कि यह निकटता स्थायी है, कि यह एक शुरुआत नहीं, बल्कि किसी पहले से चल रहे संबंध का विस्तार है।

फिर उतनी ही सहजता से वह पीछे हट जाती थी।

कोई झगड़ा, कोई स्पष्टीकरण, कोई अंतिम संवाद।

जैसे संबंध किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि किसी आंतरिक घड़ी के बंद हो जाने से समाप्त हो गया हो।

मैंने कई बार सोचाक्या यह उसकी आदत है या उसकी कोई गहरी अनिवार्यता?

चेख़व की कहानियों में अक्सर लोग बिना बड़े कारणों के टूटते हैं, बिना बड़े कारणों के चुप हो जाते हैं। वहाँ जीवन किसी निर्णायक घटना से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी अनकही दरारों से बदलता है। उसके व्यवहार में भी वही धीमी दरारें थींजो दिखती नहीं, लेकिन संबंध को भीतर से खोखला कर देती हैं।

एक दिन मैंने उसे एक किताबों की दुकान में देखा। वह किसी पुस्तक को खोलती, दो-तीन पन्ने पढ़ती, फिर बंद कर देती। मानो हर चीज़ के भीतर प्रवेश करना उसे आता हो, लेकिन भीतर टिकना नहीं।

उसकी उंगलियों की हरकतें बताती थीं कि वह चीज़ों को पकड़ती नहीं, बस छूकर छोड़ देती है।

फिर भी उसमें कोई कठोरता नहीं थी। अस्वीकार का अहंकार, दूरी का गर्व।

बस एक ऐसी शांति, जो बाहर से देखने पर सौम्य लगती है, लेकिन भीतर कहीं अनसुलझी रहती है।

प्रूस्त की दुनिया में समय स्मृति बनकर लौटता हैस्वाद, गंध, और छोटे-छोटे संकेतों के रूप में। मुझे लगता है, वह भी शायद लोगों को संबंध के रूप में नहीं, बल्कि स्मृति के संभावित रूप में जीती होगी। हर व्यक्ति उसके लिए एक पूरा अध्याय नहीं, बल्कि एक अधूरी पंक्ति की तरह रहा होगाजो कभी पूरी नहीं हुई, लेकिन फिर भी मिटती नहीं।

नर्मल वर्मा की तरह, उसके भीतर भी एक धीमा निर्वासन थाघर से नहीं, लोगों से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर बने किसी अनदेखे केंद्र से।

सबसे कठिन बात यह थी कि उसके जाने के बाद कोई खालीपन का नाटक नहीं बचता था। लोग आमतौर पर किसी के जाने के बाद शोर करते हैंयादों का, शिकायतों का, दुख का। लेकिन उसके पीछे कोई शोर नहीं था।

बस एक हल्की-सी अनुपस्थिति, जो समय के साथ और भी सामान्य लगने लगती थी।

मैंने एक बार उससे पूछा था—“क्या तुम्हें लोग जल्दी बोर कर देते हैं?”

उसने बहुत देर तक मेरी तरफ देखा, जैसे प्रश्न को सुन नहीं रही हो, बल्कि उसके पीछे छिपे अर्थ को किसी दूर के कमरे में रख रही हो।

फिर उसने कहा
बोरियत नहींबस एक दिन लगता है कि मैं वहाँ नहीं हूँ।

उस वाक्य में कोई दुख नहीं था। कोई आत्मदया नहीं थी।

वह सिर्फ एक निरीक्षण थाअपने ही व्यवहार का, जैसे कोई व्यक्ति बाहर से अपने जीवन को देख रहा हो।

अब जब मैं उसके बारे में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि वह किसी से जुड़ने और फिर हट जाने की प्रक्रिया में अस्थिर नहीं थी। वह शायद अत्यंत सुसंगत थीबस उसकी सुसंगति हमारे संबंधों की परिभाषा से बाहर थी।

और शायद यही सबसे रहस्यमय बात थी

कि वह किसी को छोड़ती नहीं थी,
वह बस वहाँ से धीरे-धीरे अदृश्य हो जाती थी,
जैसे पानी में लिखी हुई कोई रेखा।

 

 मुकेश ,,,,,,, 

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